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कविता- पुरुष का दूसरा रूप- ऋषिकेश सारस्वत

माँ! 
मैं बचपन मे सुनी थी
राक्षसों की कहानियां
स्त्रियों का अपहरण भी
फिर भी 
उनमें गरिमा थी
लेकिन किसी ने 
यह नही बताया
उससे भी डरावना
होता है इंसान!

उन दरिंदों को देखकर
नही लगता
राक्षस भी ऐसे वीभत्स होते होंगे?
मुझे खिलौना समझकर
कइयों ने खेला
जब जी नही भरा
जिंदा जला दिया मुझे!

माँ!
मुझे वो सब कुछ बताया
पिता के रूप में
सर का छत दिया
सुरक्षा कवच के रूप में
भाई का परिचय कराया
फिर क्यों तूने
पुरुष के दूसरे रूप को नही बताया?


माँ!
देखना
मेरी मौत पर
सियासतें गरम होगी
टीवी पर डिबेट चलेंगे
लोग सड़कों पर
मोमबत्तियां लेकर उतरेंगे
मेरे लिए संवेदनाएँ प्रकट करेंगे
लेकिन देखना 
फिर एक दिन 
इन्हीं लोगों में से
कोई पुरूष
किसी निर्भया या प्रियंका को
अपना शिकार बनाएंगे
इंसान शब्द को कलंकित करेंगे!
© ऋषिकेश सारस्वत 'साहित्य सुमन'

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