‘आज भी गाँधी एक संभावना है’ - रमन मैग्सेसे विजेता प्रो. संदीप पांडेय
चम्पारण टुडे न्यूज़ डेस्क।
महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ द्वारा दिनांक 16 अक्टूबर, 2019 को ‘गाँधीवाद और भारतीय लोकतंत्र’ विषय पर रमन मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त प्रख्यात गाँधीवादी चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता प्रो. संदीप पांडेय का व्याख्यान आयोजित किया गया। प्रो. संदीप जी ने अपने व्याख्यान की शुरुआत खादी और चरखे के आर्थिक आयाम से जुड़ी आत्मनिर्भर ग्राम स्वराज की गाँधीवादी अवधारणा से की। उन्होंने मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति से जुड़ी गाँधीवादी अर्थव्यवस्था की आत्मनिर्भरता के बरक्स भोग केंद्रित बाज़ारवाद की विसंगतियों पर प्रकाश डाला। कल कारखानों में बड़े पैमाने पर होने वाले उत्पादन के साथ पर्यावरण प्रदूषण की समस्या जिस प्रकार नाभि-नाल रूप से जुड़ी हुई है, उस पर भी प्रो. संदीप ने ध्यान आकर्षित किया।
उन्होंने शिक्षा और परीक्षा के अलगाव को रेखांकित करते हुए एक शिक्षक के रूप में अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया स्वैच्छिक और प्रतिस्पर्धाविहीन होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को किसी परीक्षा के आधार पर उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण करना शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य नहीं हो सकता। यह काम शिक्षा से जुड़े तंत्र का हो सकता है, जिसे उपाधियाँ बांटनी होती है।
सुख-सुविधाओं के पीछे भागते आज के आधुनिक जीवन में गाँधी को यूटोपिया और अव्यावहारिक बताने वाले लोगों के समक्ष उन्होंने अमेरिका के आमिष समुदाय का उदाहरण पेश करते हुए बताया कि आज भी गाँधी एक संभावना है। आर्थिक विकास केंद्रित आधुनिक उद्योगों और कारखानों के साथ पर्यावरण प्रदूषण की जो भयावह समस्या आज पैदा हो गई है, उसे लेकर प्रो. संदीप ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए गाँधी जी द्वारा दिखाये लघु-कुटीर उद्योगों के रास्ते को अपनाने पर बल दिया।
अमेरिका और ईरान के उदाहरण पेश करते हुए उन्होंने क्रमश: शिक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लोकव्यापीकरण पर बल दिया। इसके साथ ही उन्होंने संसाधनों के न्यूनतम उपयोग के साथ उपभोक्तवाद पर लगाम लगाने की बात कही ताकि इस धरती को नष्ट होने से बचाया जा सके। उन्होंने कहा कि यह धरती हमारे पेट की भूख को तो वहन कर सकती है लेकिन उपभोग की भूख को नहीं। अंत में उन्होंने दूसरों को पीछे छोड़ आगे बढ़ने और सब कुछ को अपनी मुट्ठी में कैद कर लेने की चूहा दौड़ से बाहर निकलने पर बल दिया।

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