रिश्वत : ऋषिकेश सारस्वत
दोस्तों ! जब मन विचलित होता है तो पंक्तियाँ स्वयं ही अपना काव्य रूप धारण कर लेता है। नविन रचना रिश्वत आपके समक्ष प्रस्तुत है। आपकी प्रतिक्रिया के इंतजार में. ..........
साहब !
मैं आम आदमी हूँ
कहाँ से दू इतने रुपये
दिन कमाता,
रात खाता हूँ
फिर क्यों ?
अपने ही हक के लिए
रिश्वत देने पड़ते है !
मैं मध्यमवर्गीय भी नहीं
दो रुपये के लिए
अपने बेटे को
चॉक्लेट के लिए
डांटता हूँ
ऐसे में
रिश्वत कहाँ से दू !
सिर्फ रिश्वत नहीं देने से
मेरे अधिकारों को
किसी और को दे देते हो
मैं आम आदमी
सिर्फ योजनाओं को
समझकर संतुष्ट होता हूँ
इन योजनाओं के लिए
नहीं है रिश्वत मेरे पास !
© ऋषिकेश सारस्वत 'साहित्य सुमन'

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