साहित्य: प्रश्नचिन्ह हूँ......... ? - ऋषिकेश सारस्वत
दिल्ली में हुई निर्भया कांड ने पुरे देश को झकझोर कर रख दिया था। जनवरी 2015 में रचित यह कविता "प्रश्नचिह्न हूँ..... ?" आज भी प्रासंगिक है. इस कविता का शीर्षक मेरे परम मित्र निर्भय पांडेय ने दी थी।
माँ........!
नाराज हूँ तुमसे
जन्म लेते हीं
मार क्यों नहीं दिया तूने...?
जब जानती थी !
मेरा कोई मूल्य नहीं
लोग
रौंद डालते है स्त्रियों को
ठीक उसी तरह
हाथी अपने मद में
रौंद डालता है फसलों को !
तुम भी तो स्वतंत्र नही
सिर्फ जीवन जी रही हो
घर में भी
अपने अस्तित्व से लड़ रही हो
इतना सब कुछ जानते हुए
मेरे बारे में क्यों नहीं सोचा तूने.
मैं भी लड़की हूँ !
बड़ी बेरहमी से
इन दरिंदो ने
कुचला है मुझे
मुझे देखकर
अब जी सकोगी तुम.?
मैं भी तो नहीं जी सकुंगी
नहीं ! समाज नहीं जीने देगी
अरमान भी तो मर चुके है
जीकर अब क्या होगा..?
मैं भी एक दामिनी हूँ................!

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