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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी का चम्पारण यात्रा

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने अपने पद यात्रा के दौरान गांधी के भितिहरवा आश्रम (प.च.) की दुर्दशा पर असंतोष जताया था व बहुत आहत थे:-अर्जुन भारतीय

डी.एन.कुशवाहा,रामगढ़वा।
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के  जन्मदिन पर उनकी चंपारण से जुड़ी हुई अनेक महत्वपूर्ण संस्मरणों पर प्रकाश डालते हुए अर्जुन भारतीय सदस्य हिन्दी सलाहकार समिति कृषि कल्याण मंत्रालय भारत सरकार ने बुधवार को कहा कि चंद्रशेखर ने भितिहरवा गांधी आश्रम (प.च.) से 1986 के जनवरी माह में 10 दिनों की पदयात्रा थी। जो रामनगर  बगहा ,लौरिया, कुमारबाग होते हुए जिला मुख्यालय बेतिया में समाप्त हुई थी।पदयात्रा शुरू करते वक्त भितिहरवा में चंद्रशेखर ने एक सभा को संबोधित किया और गांधी के भितिहरवा  आश्रम की दुर्दशा पर असंतोष जताया। भितिहरवा के आश्रम की दुर्दशा देख वे बहुत आहत थे। ऐसी बदहाल स्थिति के मद्देनजर उन्होंने गांधी आश्रम के जीर्णोद्धार का संकल्प दोहराया। आश्रम के पुनरुद्धार के लिए तिथि भी तय कर दी। यह बात दूर तक फैली। सरकार के कान खड़े हो गए। तब बिहार में कांग्रेस की सरकार थी। स्व. बिंदेश्वरी दुबे उस वक्त मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान थे। तय तारीख पर चंद्रशेखर भितिहरवा पहुंचे।
इसके एक -दो रोज पहले ही पुलिस प्रशासन ने भितिहरवा के गांधी आश्रम को ससस्त्र पुलिस बल ने अपने घेरे में ले लिया। राज्य सरकार ने घोषणा भी कर दी कि भितिहरवा  के गांधी आश्रम को राज्य सरकार बनवाएगी। परंतु, राज्य सरकार ने महीनों तक इस दिशा में जब कुछ भी नहीं किया तो , चंद्रशेखर ने दोबारा आने की घोषणा की। उनके आने की आहट पाकर सरकार ने आश्रम के जीर्णोद्धार का कार्य तेजी से शुरू कर दिया। फिर भी चंद्रशेखर ने भितिहरवा में आश्रम से अलग हटकर गांधी संग्रहालय के निर्माण की योजना मन में बना ली। इसके लिए कुछ एकड़ जमीन अरविंद चौहान से प्राप्त भी कर ली।उन्ही अरविंद चौहान से, जिनके पूर्वजों ने गांधी आश्रम को जमीन दी थी। कालांतर में गांधी संग्रहालय का काम शुरू हो गया था। इस निर्माण की देख-रेख शेख सरफुद्दीन तथा अरविंद चौहान के जिम्मे था। उधर, सरकार  गांधी आश्रम का जीर्णोद्धार कर रही थी और इधर चंद्रशेखर गांधी संग्रहालय का निर्माण कार्य। कालांतर में चंद्रशेखर की सियासी व्यस्तता तथा बाद में कैंसर की बीमारी की उलझन बढ गई और गांधी संग्रहालय का काम बहुत कुछ होने के बाद भी अधूरा रह गया, जो आज भी अधूरा है ।और शायद ,आगे भी अधूरा रह जाएगा ।क्योंकि चंद्रशेखर अब इस दुनिया में ही नहीं हैं।हां ,चर्चा हो रही थी चंद्रशेखर की पदयात्रा की   जो भितिहरवा से चलकर रामनगर ,बगहा ,लोरिया ,चनपटिया ,कुमारबाग बुनियादी हायर सेकेंडरी स्कूल में पहुंची थी ,जहां चंद्रशेखर ने एक आम सभा को संबोधित किया। यहां एक गोष्ठी का भी आयोजन हुआ। यहां की पूरी व्यवस्था विद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य शंभू नाथ मिश्रा (पजीअरवा, सुगौली) ने की थी। इसके पहले सभी प्रमुख गांव -बाजार तथा चौक-चौराहों पर नुक्कड़ सभाएं करते हुए पदयात्रा आगे बढ़ती रही थी। पदयात्रा के रात्रि ठहराव की पूरी व्यवस्था धर्मेश प्रसाद वर्मा उर्फ धामू बाबू की होती थी। इस व्यवस्था में बेतिया निवासी जनता पार्टी के जिला अध्यक्ष रामकुमार झुनझुनवाला तथा तेजी से राजनीतिक उभार में आए अंबिका सिंह (बगहा) का भी सहयोग था।पदयात्रा में जनता पार्टी के नेताओं -कार्यकर्ताओं के साथ -साथ जन भागीदारी भी भारी संख्या में होती थी। हर जगह लोग चंद्रशेखर को सुनने तथा स्वागत करने के लिए उत्साहित नजर आते थे। 14 जनवरी मकर संक्रांति पर कई जगहों में खिचड़ी का भोज लोगों ने कराया था। पदयात्रा में बिहार से बाहर के नेता भी थे और बिहार के नेता- कार्यकर्ता भी। 1977 में बनी जनता सरकार के समय बिहार विधानसभा के अध्यक्ष रहे त्रिपुरारी प्रसाद सिंह ,अयूब साहब, विजय कृष्ण ,रघुनाथ झा ,राम बहादुर सिंह, उमा शंकर सिंह ,समेत अनेक सांसद- विधायक भी पदयात्रा में साथ- साथ चल रहे थे। इस पदयात्रा में मेरे साथ रक्सौल के दर्जनों जनता पार्टी तथा युवा जनता के युवा साथी शरीक रहे थे। इनमें प्रमुख रुप से प्रमोद कुमार सिंह , डॉक्टर हरेंद्र वर्मा , रामा शंकर सहनी,  संतोष सर्राफ, अशोक कुमार गुप्ता, जे पी सेनानी भरत प्रसाद गुप्ता के नाम शामिल हैं। ।
उस पदयात्रा की कैमरे से फोटोग्राफी कर रहे मेरे अजीज साथी संतोष सर्राफ ने ,जो आज हमारे बीच नहीं हैं, बहुत महत्वपूर्ण तस्वीरें खींची थी और एल्बम बनवाया था। उनके जाने के बाद उस एल्बम की कमी खलती है।
         10 दिनों की यह पदयात्रा बेतिया में एक जनसभा के संबोधन के साथ संपन्न हुई थी। इस सभा में चंद्रशेखर ने गमछा फैलाकर लोगों से भितिहरवा गांधी आश्रम के जीर्णोद्धार के लिए पैसे की भीख मांगी थी। लोगों ने दिल खोलकर उसमें रुपये का दान किया था। इंजीनियर बृज बिहारी प्रसाद (आदापुर) ने ₹5000 चंद्रशेखर के गमछे में दान किया था। मेरी उत्प्रेरणा से बृज बिहारी जी ने उसी वक्त मंच पर जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। मैंने ही बृज बिहारी जी को पदयात्रा की समाप्ति के बाद पार्टी में शामिल होने का उचित अवसर बताया था, जिसे उन्होंने कबूल किया ।
         चंद्रशेखर की यह पदयात्रा जब 1986 में शुरू हुई थी ,तब पश्चिमी चंपारण का पूरा क्षेत्र दस्यु  सरदारों के गिरफ्त में था। अपहरण तथा फिरौती का धंधा जोरों पर था। लोगों में तबाही मची हुई थी। त्राहिमाम मचे माहौल में चंद्रशेखर की पदयात्रा, वह भी जंगल के बीच से, पुलिस तथा प्रशासन के लिए भारी सिर दर्द का कारक बन गई थी।  परेशान पुलिस- प्रशासन ने उनकी पदयात्रा को लगभग पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया था। अपहरण उद्योग के आतंक से परेशान पुलिस- प्रशासन को यह डर सता रहा था कि चंद्रशेखर जैसे राजनेता के साथ कुछ अनहोनी हुई,तब देश में हलचल मचेगी? और इस सबसे बिल्कुल अछूता चंद्रशेखर निश्चिंत -निर्भिक होकर अपनी पदयात्रा निर्विकार भाव से जारी रखे हुए थे। आगे-आगे चंद्रशेखर और पीछे -पीछे जनता का हुजूम। इस तरह दहशत में जी रहे चंपारण की धरती पर चंद्रशेखर की पदयात्रा सकुशल संपन्न हो गई। दहशत में डूबे चंपारण के लोगों में व्याप्त खौफ में भी कुछ कमी आई। लेकिन पदयात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि आजादी के बाद बदहाली में पड़े भितिहरवा गांधी आश्रम के जीर्णोद्धार के रूप में जरूर हुई। चंद्रशेखर होते तो, आश्रम और भी चमकता तथा गांधी संग्रहालय भी राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो जाता। काश! कोई दूसरा चंद्रशेखर सामने उभरता तो बड़ी तसल्ली होती। किसी दूसरे चंद्रशेखर की प्रत्याशा में चंपारण जाने कब तक पलक पावड़े बिछाए रहेगा? टकटकी लगाए।(तृतीय किस्त).

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