कविता: मैं क्या हूँ? - ऋषिकेश सारस्वत
ऋषिकेश सारस्वत 'साहित्य सुमन'
पत्रकार तथा सामाजिक कार्यकर्ता
मन जब सामाजिक विषमताओं के कारण व्यग्र होता है तो शब्द अपना आकर पाने लगता है। इसी कड़ी में "मैं क्या हूँ"
(1)
मैं क्या हूँ?
एक पीड़िता
या
राजनीति!
मैं क्या हूँ?
टीवी की डिबेट
या
विरोधियों का
एक मुद्दा!
या
सत्ता की चुनौती!
मैं क्या हूँ?
पुरुषों का खिलौना
या
टीवी का विज्ञापन
या
राजनीति की कठपुतली
या धर्म?
(2)
मेरी पहचान मिट चुकी है
शायद
अब लड़की/औरत मर चुकी है
आब रेप लड़की से नही होती
लोग बलात्कार करते है
हिन्दू की! मुसलमान की!
सिक्ख की! ईसाई की!
पत्रकार तथा सामाजिक कार्यकर्ता
मन जब सामाजिक विषमताओं के कारण व्यग्र होता है तो शब्द अपना आकर पाने लगता है। इसी कड़ी में "मैं क्या हूँ"
(1)
मैं क्या हूँ?
एक पीड़िता
या
राजनीति!
मैं क्या हूँ?
टीवी की डिबेट
या
विरोधियों का
एक मुद्दा!
या
सत्ता की चुनौती!
मैं क्या हूँ?
पुरुषों का खिलौना
या
टीवी का विज्ञापन
या
राजनीति की कठपुतली
या धर्म?
(2)
मेरी पहचान मिट चुकी है
शायद
अब लड़की/औरत मर चुकी है
आब रेप लड़की से नही होती
लोग बलात्कार करते है
हिन्दू की! मुसलमान की!
सिक्ख की! ईसाई की!


कोई टिप्पणी नहीं
Thanks for your valuable feedback.