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प्रसव -पीड़ा में परीक्षा सुधार प्रक्रिया:-अर्जुन

प्रसव -पीड़ा में परीक्षा सुधार प्रक्रिया:-अर्जुन
अर्जुन भारतीय की फाइल फोटो
डी.एन.कुशवाहा, पत्रकार प्रेस परिषद् जिलाध्यक्ष पूर्वी चंपारण
रामगढ़वा-यूपी एवं बिहार में बोर्ड की चल रही परीक्षा में नकल पर नकेल कसने की लंबे  अरसे बाद प्रभावकारी कार्रवाई की जा रही है । बिहार में भी बोर्ड परीक्षा  में  इस बार  मुकम्मल मुस्तैदी है । पूरे यूपी में परीक्षा केंद्रों पर बड़ी संख्या में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं ।80 के दशक से धीरे-धीरे परीक्षा -पात्रता में घुन लगता गया । यूपी और बिहार में भी इस बार दोनों प्रदेशों में शिक्षा प्रेमियों में आस जगी है। फिर भी शिक्षा माफिया अपनी हरकतो को चोरी छिपे अंजाम देने से बाज नहीं आ रहे हैं। कल यूपी के मथुरा में सात मुन्ना भाई पकड़े गए। यह लोग दूसरे परीक्षार्थियों की जगह परीक्षा दे रहे थे । बलिया में परीक्षा केंद्र से बाहर एक मकान में 6 लोग गिरफ्तार हुए, जिनमें एक नकल कराने वाले तथा 5 नकलची छात्र थे। नकलची उसी पुरानी परंपरा का निर्वहन कर रहे थे । जिसमें परीक्षा कॉपी के ऊपरी पेज केंद्र के भीतर रखे गए थे और भीतरी पन्ने लिखने के लिए बाहर आए थे। लिखने के बाद वे भीतर जाकर बाहरी पन्ने में भर दिए जाते। जैसे पहले से होता रहा है। इस  तरह के नकलची प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी छिटपुट पकड़े गए' फिर भी संतोष है कि सीसीटीवी कैमरे का भूत का गंभीर प्रभाव नकलचियों पर पड़ा है । और परीक्षा पारदर्शी बनी है । अब तक यूपी के 66 लाख से अधिक परीक्षार्थियों में करीब 10 लाख परीक्षार्थियों ने परीक्षा को तौबा कर दिया है। बिहार बोर्ड की परीक्षा में भी छिटपुट नकलचियों को गिरफ्तार किया गया है। बहुत हद तक परीक्षा में पारदर्शिता कायम हुई है।यह प्रथम प्रभावकारी प्रयास है।इसलिए यह प्रक्रिया अभी "प्रसव पीड़ा" झेल रही है । बोर्ड परीक्षा से लेकर विश्वविद्यालय परीक्षा तक शिक्षा माफियाओं की पैठ बहुत गहरी हो चुकी है।यह जकड़न करीब 4 दशकों में मजबूती पाई है। माफियाओं के संरक्षण में सिर्फ नकलची परीक्षार्थी ही नहीं ,बल्कि फर्जी परीक्षार्थी भी परीक्षा में शामिल एवं सफल होते रहे हैं। अच्छे प्राप्तांक के साथ।पैसे और माफियाओं के प्रभाव से डिग्री प्राप्त ऐसे हजारों छात्रों ने  सरकारी नौकरियां भी प्राप्त की है ।अच्छी-अच्छी नौकरियां भी माफियाओं ने बीपीएससी की परीक्षाओं में शामिल करा कर भारी संख्या में अवर समाहर्ता  डीएसपी तथा अन्य राजपत्रित अधिकारियों को बनाने में कामयाबी हासिल की है। माफियाओं की कृपा से पड़ोसी राष्ट्र नेपाल के हजारों छात्रों ने बोर्ड से लेकर विश्वविद्यालय तक की डिग्रियां लेकर नेपाल में चार दशक में छोटे से लेकर बड़े अधिकारी तक बने हैं ।एसपी से आईजीतक तथा जिलाधिकारी से सचिव तक। ऐसे में शिक्षा माफियाओं की पैठ को तोड़ना सीमा के युद्ध जैसा जटिल है। क्योंकि ,शिक्षा- माफिया गिरोह "तू डाल डाल ,हम पात-पात" की रणनीति में माहिर है और अपने कुशल रणनीति के सहारे इस गंदे खेल के गोरखधंधे को बखूबी चलाते रहें हैं। इस गोरखधंधे से गिरोह ने गिरोह पर गिरोह खड़ा किया है।औरबड़े पैमाने पर धनोपार्जन भी किया है । इसीलिए  शिक्षा माफियाओं की  बड़ी ताकत को  मिटाने के लिए  बड़ी जुझारु एवं समर्पित फौज की जरूरत है । आज की अक्षम एवं लावारिस फौज सरकारी तंत्र से लड़ाई  में जीत  संदिग्ध दीखती है । वह भी भ्रष्ट एवं लालची सरकारी तंत्र के होते। फिर भी "हारिए न हिम्मत, बिसारिए न ,हरि नाम" के हौसले से शिक्षा की विकृति को जड़ से मिटाने और मृतप्राय बनी शिक्षा को जिंदा बनाने में हम सबों को, समाज को, देश को, प्रदेश को ,कठोर संकल्प के साथ प्रयास करने में लगना चाहिए। चतुर्दिक संकल्पित प्रयास से ही इस जड़ जमाई बीमारी से मुक्त हुआ जा सकता है। यह तो ,एक पक्ष है । दूसरा पक्ष,जो सबसे महत्वपूर्ण है परीक्षा से भी।वह है ,पठन -पाठन का पक्ष। यह पक्ष तो बिल्कुल ध्वस्त हो चुका है। पठन-पाठन ही शिक्षक का मेरुदंड है। बिल्कुल जर्जर नीव पर महल खड़ा करना जैसे नामुमकिन है। वैसे ही पठन-पाठन हीनता में परीक्षा का देना- लेना। पहले सिर्फ प्राथमिक विद्यालयों में पठन पाठन की कमजोर व्यवस्था थी। कालांतर में वह कमजोरी हाई स्कूल तक पहुंची ।अब वह एक दशक के भीतर विश्वविद्यालयों में पहुंच गई है। पठन-पाठन की व्यवस्था बिल्कुल लचर और ना के बराबर है। शिक्षा के रास्ते में इससे बड़ी मुसीबत शिक्षकों की कमी है। जहां प्राइमरी स्कूलों में निर्धारित शिक्षकों की संख्या में 20 -25% की कमी है । वही हाई स्कूलों में यह कमी 35 से 40% की है ।इसके ऊपर की पढ़ाई में यह कमी 50 से 60% की है। शुरू में पठन पाठन में कोताही की बीमारी प्राथमिक विद्यालयों में फैली। बाद में हाई स्कूल तक। फिर वह बीमारी कॉलेजों में पहुंची।अब तो विश्वविद्यालय में पठन -पाठन में कोताही की बीमारी फैल चुकी है।ऐसे में पठन -पाठन की व्यवस्था को सुचारु एवं सक्षम बनाना कितना कठिन है ? इसे सहज रुप से सोचा- समझा जा सकता है। सरकारी विद्यालयों के पठन -पाठन में कदम -कदम पर खामियां हैं। सरकार की इच्छा शक्ति भी कमजोर हो गई लगती है। शिक्षा के महत्व को, जो देश- समाज की जीवन -रेखा की आधार ताकत है, पर सोचने-विचारने के गंभीर प्रयास का खालीपन नजर आता है। हमारी आंतरिक आकांक्षा है कि पूरी शिक्षा प्रक्रिया में सुधार का तूफान खड़ा हो ।और यह अभी से शुरु हो। वर्ष 2018 सुधार प्रक्रिया का "नीव का पत्थर "भी बने और "मील का पत्थर" भी।

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