पूर्वी चम्पारण(मोतिहारी):-बाढ़ ने रामगढ़वा प्रखंड के तिरवाह क्षेत्र के लोगों को किया कंगाल
*बाढ़ ने रामगढ़वा प्रखंड के तिरवाह क्षेत्र के लोगों को किया कंगाल*
भेड़िहाडी गाव निवासी जालिम मियां तथा श्री भगवान प्रसाद बताते हैं कि नदी के बीच रेता में उनका खेत है ,वहीं पर मकान बनाकर खेती बारी करते हैं। पिछले साल बाढ़ ने फसल नहीं होने दिया तो इस साल 3 बीघे धान का फसल बाढ़ के पानी में डूबकर बर्बाद हो गया । उन्होंने बताया कि दो वर्ष पूर्व अपनी लड़की कि शादी तय की थी ।लेकिन बाढ़ के चलते पिछले साल शादी की तारीख बढ़ा दी । हालात इस साल
पिछले साल से भी बदतर हैं ,जिसके चलते इस वर्ष भी बिटिया के हाथ पीले कर पाना संभव नहीं लग रहा है।
अधकपरिया निवासी इसहाक हाफिज का कहना है कि बाढ़ के चलते रिश्तेदारों से भी संबंध बहुत कम ही चल पाता है। सब कुछ होने के बाद भी कुछ नहीं बचता है । बाढ़ आता है और हमलोगों का सपना चकनाचूर करते हुए अपने साथ सब कुछ बहाकर ले जाता है।वहीं पिपरपाती गाँव निवासी अवध किशोर प्रसाद, प्रताप महतो तथा अंजय यादव आदि लोगों ने बताया कि साल भर में मेहनत मजदूरी करके जितना हमलोग इक्कठा करते हैं वह सब एक ही पल में खत्म हो जाता है। आगे अपनी व्यथा सुनाते हुए बताते हैं कि बाढ़ के चलते इस क्षेत्र में बच्चे- बच्चियों से शादी करने के लिए जल्दी कोई तैयार नहीं होता है। बाढ़ आने से पहले ही इस क्षेत्र के लड़के गांव के बाहर कमाने चले जाते हैं। क्योंकि बाढ़ के वक्त परिवार का भरण-पोषण करना सबसे कठिन काम होता है।
फुलवरिया गांव की मरछीया तथा तेतरी देवी बताती हैं कि खून पसीने की कमाई सिकरहना नदी का बाढ़ पल भर में अपने साथ बहा ले जाता है। घर में लड़के बीमार हो जाएं तो उपचार के लिए भी पैसा नहीं रहता है। प्रशासन व जनप्रतिनिधियों से भी हमलोगों को कोई खास मदद नहीं मिलता है। साथ ही उन्होंने बताया कि बाढ़ के पानी ने हमलोगों का मकाऩ निगल लिया है। तिरपाल के सहारे पूरे परिवार के साथ गुजर बसर हो रहा है। बाढ़ के चलते मेहनत मजदूरी का कार्य भी नहीं मिल पाता है। जिससे दो वक्त की रोटी जुटा पाना काफी मुश्किल हो गया है।
त्रिवेणी निवासी गोकुल मांझी बताते हैं कि उजड़ना और बसना अब हम लोगों की नियति बन गई है। खून पसीना बहाकर साल भर जुटाते हैं और नदी की बाढ़ आता है और पल भर में सब कुछ अपने साथ बहाकर ले जाता है। खेती न होती तो दूसरे गांव में जाकर बस जाते , लेकिन खेती के सहारे ही परिवार चलता है। खेतों में धान का बहुत अच्छा फसल लगा था जो बाढ़ के पानी में विगत 15 दिनों से डूबा हुआ है।इस साल की फसल होने कि अब कोई उम्मीद नहीं है। वहाँ के लोगों ने बताया कि सबसे अजीब स्थिति तो इस क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की है । चाहे सांसद , विधायक या प्रशासन के अधिकारी हों।कोई भी इस क्षेत्र के सड़क,नाला,पानी तथा विकास के संबंध में कभी नहीं सोचता है ।
![]() |
| टूटे हुए कैशरे हिन्द बांध की तस्वीर |
चम्पारण टुडे से डी.एन.कुशवाहा*
रामगढ़वा-स्थानीय थाना क्षेत्र के पश्चिमी क्षेत्र तिरूवाह के अधकपरिया ,पिपरपाती, भेड़िहारी तथा मुर्गीया टोला आदि गाँवों मे बूढ़ी गंडक नदी में आए उफान की वजह से 30 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ते हुए कैशरे हिन्द बांध टूट गया। जिसकी वजह से आए प्रलयकारी बाढ़ ने तबाही मचा दी। जिसकी वजह से बाढ़ पीड़ितों का दर्द सिर्फ दो जून की रोटी और तन ढकने का कपड़ा ही नहीं है। किसी को बेटी के हाथ पीले करने की फिक्र सता रही है तो कोई इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। यहाँ के लोग जानवर से भी बदतर जीवन जीने को विवश हैं। वैसे तो प्रतिवर्ष सिकरहना का पानी अपनी चपेट में लेकर तिरवाह क्षेत्र के सैकड़ों परिवारों को बेघर कर दाने-दाने को मोहताज बना जाती है। इस दौरान सबसे बड़ी समस्या होती है इनके बेटी और बेटों की शादी- विवाह, बुजुर्गों का उपचार कैसे कराएं । जब पूरा समय घर बसाने और दो जून की रोटी की व्यवस्था करने में बीत जाता है। वर्षों से इनके दर्द का स्थायी निदान निकलाने के लिए प्रदेश के सत्तासीन नेता आते हैं , वादे करते हैं , जुबानी करोड़ों रुपये खर्च करते हैं और समस्या हल करने के नाम पर सिर्फ वहीं ढाक के तीन पात की तरह रह जाती है। यह हालात रामगढ़वा के सुदूरवर्ती तिरूवाह के करीब 8 पंचायतो के पचास गांवों के एक लाख की आबादी का है। इसके कुछ उदाहरण पूरी तस्वीर को प्रदर्शित करने के लिए काफी हैं। भेड़िहाडी गाव निवासी जालिम मियां तथा श्री भगवान प्रसाद बताते हैं कि नदी के बीच रेता में उनका खेत है ,वहीं पर मकान बनाकर खेती बारी करते हैं। पिछले साल बाढ़ ने फसल नहीं होने दिया तो इस साल 3 बीघे धान का फसल बाढ़ के पानी में डूबकर बर्बाद हो गया । उन्होंने बताया कि दो वर्ष पूर्व अपनी लड़की कि शादी तय की थी ।लेकिन बाढ़ के चलते पिछले साल शादी की तारीख बढ़ा दी । हालात इस साल
![]() |
| क्षतिग्रस्त बांध की तस्वीर |
अधकपरिया निवासी इसहाक हाफिज का कहना है कि बाढ़ के चलते रिश्तेदारों से भी संबंध बहुत कम ही चल पाता है। सब कुछ होने के बाद भी कुछ नहीं बचता है । बाढ़ आता है और हमलोगों का सपना चकनाचूर करते हुए अपने साथ सब कुछ बहाकर ले जाता है।वहीं पिपरपाती गाँव निवासी अवध किशोर प्रसाद, प्रताप महतो तथा अंजय यादव आदि लोगों ने बताया कि साल भर में मेहनत मजदूरी करके जितना हमलोग इक्कठा करते हैं वह सब एक ही पल में खत्म हो जाता है। आगे अपनी व्यथा सुनाते हुए बताते हैं कि बाढ़ के चलते इस क्षेत्र में बच्चे- बच्चियों से शादी करने के लिए जल्दी कोई तैयार नहीं होता है। बाढ़ आने से पहले ही इस क्षेत्र के लड़के गांव के बाहर कमाने चले जाते हैं। क्योंकि बाढ़ के वक्त परिवार का भरण-पोषण करना सबसे कठिन काम होता है।
फुलवरिया गांव की मरछीया तथा तेतरी देवी बताती हैं कि खून पसीने की कमाई सिकरहना नदी का बाढ़ पल भर में अपने साथ बहा ले जाता है। घर में लड़के बीमार हो जाएं तो उपचार के लिए भी पैसा नहीं रहता है। प्रशासन व जनप्रतिनिधियों से भी हमलोगों को कोई खास मदद नहीं मिलता है। साथ ही उन्होंने बताया कि बाढ़ के पानी ने हमलोगों का मकाऩ निगल लिया है। तिरपाल के सहारे पूरे परिवार के साथ गुजर बसर हो रहा है। बाढ़ के चलते मेहनत मजदूरी का कार्य भी नहीं मिल पाता है। जिससे दो वक्त की रोटी जुटा पाना काफी मुश्किल हो गया है।
त्रिवेणी निवासी गोकुल मांझी बताते हैं कि उजड़ना और बसना अब हम लोगों की नियति बन गई है। खून पसीना बहाकर साल भर जुटाते हैं और नदी की बाढ़ आता है और पल भर में सब कुछ अपने साथ बहाकर ले जाता है। खेती न होती तो दूसरे गांव में जाकर बस जाते , लेकिन खेती के सहारे ही परिवार चलता है। खेतों में धान का बहुत अच्छा फसल लगा था जो बाढ़ के पानी में विगत 15 दिनों से डूबा हुआ है।इस साल की फसल होने कि अब कोई उम्मीद नहीं है। वहाँ के लोगों ने बताया कि सबसे अजीब स्थिति तो इस क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की है । चाहे सांसद , विधायक या प्रशासन के अधिकारी हों।कोई भी इस क्षेत्र के सड़क,नाला,पानी तथा विकास के संबंध में कभी नहीं सोचता है ।


कोई टिप्पणी नहीं
Thanks for your valuable feedback.