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कोरोना से घायल होता वैश्विक अर्थव्यवस्था

लेखक नृपेन्द्र अभिषेक नृप।

मानव के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था को बीमार करने में कोरोना का महत्वपूर्ण योगदान है। कोरोना वायरस महामारी इस सदी का सबसे बड़ा वैश्विक संकट है। इसका विस्तार और गहराई बहुत ज्यादा है। इस सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से पृथ्वी पर 7.8 अरब लोगों में से हर एक को खतरा है। इस बीमारी ने पूरे विश्व-के जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है और सभी बाजारों को बाधित कर दिया है। कोरोना वायरस ने जिस तरह से दुनिया के देशों की सरकारों की क्षमताओं या उनकी कमजोरियों को उजागर किया है, उससे काफी हद तक निश्चित है कि यह राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में मौजूदा तौर-तरीकों में स्थायी रूप से ऐसे बड़े बदलाव लाएगा, जो केवल बाद में ही चलकर पूरी तरह स्पष्ट हो पाएंगे।
लेखक नृपेन्द्र अभिषेक नृप।
दुनियाभर में तेजी के साथ फैल रहे घातक कोरोना वायरस ने वैश्विक अर्थव्यस्था को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इसके चलते वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग और आपूर्ति दोनों पर असर पड़ा है। कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच दो महीने पहले उच्चतम स्तर पर रहने वाला स्टॉक मार्केट में आज भारी गिरावट आ चुकी है। तेल की बढ़ी आपूर्ति और मांग में कमी के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की तरफ से कोरोना पर 24 जनवरी को हुई पहली बैठक के बाद से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट आ रही है। कोरोना का दुनिया के व्यवसायों पर असर साफतौर पर देखा जा सकता है, जहां कंपनियां अपने ऑपरेशंस कम कर रही हैं, कर्मचारियों से यह कहा जा रहा है कि वे घरों से काम करें और उत्पादन के लक्ष्य को कम किया जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवेलपमेंट (UNCTAD) ने ख़बर दी है कि कोरोना वायरस से प्रभावित दुनिया की 15 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत भी है। चीन में उत्पादन में आई कमी का असर भारत से व्यापार पर भी पड़ा है और इससे भारत की अर्थव्यवस्था को क़रीब 34.8 करोड़ डॉलर तक का नुक़सान उठाना पड़ सकता है।यूरोप के आर्थिक सहयोग और विकास संगठन यानी ओईसीडी ने भी 2020-21 में भारत की अर्थव्यवस्था के विकास की गति का पूर्वानुमान 1.1 प्रतिशत घटा दिया है।ओईसीडी ने पहले अनुमान लगाया था कि भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.2 प्रतिशत रहेगी लेकिन अब उसने इसे कम करके 5.1 प्रतिशत कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी के अनुसार कोरोना वायरस की महामारी के कारण दुनिया भर में लगभग 2.5 करोड़ नौकरियां खत्म हो सकती हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित नीतिगत कार्रवाई के जरिए वैश्विक बेरोजगारी पर कोरोना वायरस के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकती है।

आर्थिक रूप से बढ़ती श्रम लागतें, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प के चीन के साथ व्यापार युद्ध, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और 3डी प्रिंटिंग जैसे मुद्दे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर असर डालते रहे हैं। कोरोना वायरस के हमले के बाद कंपनियां अब मल्टीस्टेप, मल्टीकाउंट सप्लाई चेन को बहुत हद कर सिकोड़ लेंगी, जो आज दुनिया के औद्योगिक उत्पादन परिदृश्य पर हावी हैं। कोविड-19 ने अब इनमें से कई सप्लाई लिंक्स को तोड़ दिया है। कोरोना प्रभावित क्षेत्रों में फैक्ट्रियां बंद होने से दूसरे निर्माताओं, अस्पतालों, फार्मेसियों, सुपरमार्केटों और खुदरा स्टोरों में उत्पादों की कमी हो गई है। ई-कॉमर्स की दिग्गज अमेज़न के प्लेटफार्म से जुड़ी केवल 45% चीनी कंपनियां ही अभी सामानों की सप्लाई कर रही हैं। इसके कारण अमेजन ने इटली और फ्रांस में गैर जरूरी सामानों की आपूर्ति के आर्डर लेना रोक दिया।

दुनिया में इस वायरस के चलते पर्यटकों की संख्या घट सकती है. इसका सीधा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। पहले ही चीन की अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर में है। अर्थव्यवस्था पर कोरोना वायरस का प्रभाव काफी कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि ये वायरस कितनी आसानी से फैल सकता है और इससे संक्रमित होने वाले लोगों की मौत की आशंका किस हद तक है।अच्छी बात ये है कि इससे संक्रमित होने वाले काफी लोगों में पूरा सुधार देखा गया है, हालांकि इसके दुखद अपवाद भी रहे हैं।अक्सर ये देखा गया है कि आर्थिक समस्याओं को लेकर प्रतिक्रिया देने में वित्तीय बाज़ार ज़्यादा देरी नहीं करते।क्योंकि यहां बिज़नेस करने वाले ट्रेडर्स भविष्य के घटनाक्रम को भांपकर ही चीज़ों पर दांव लगाते हैं। अब तक जितने भी वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने इसके बारे में जानकारी दी है। इससे एक बात तो साफ है कि लोगो से दूरी बना कर ही कोरोनो को फैलने से रोका जा सकता है।कोरोना वायरस के कारण जो आर्थिक क्षति और सामाजिक तनाव सामने आया है, उसे देखते हुए राष्ट्रवादी उभार और ताकतवर देशों की शक्ति प्रतिद्वंद्विता और ज्यादा बढ़ेगी। किसी भी तरह से कोरोना वायरस संकट अंतरराष्ट्रीय शक्ति संरचना में जरूर बदलाव लायेगा। इसके अलावा इस समय और कुछ भी कह पाना मुश्किल है। 

कोरोना वायरस महामारी के कारण अगर आने वाले समय में पश्चिमी देशों के व्यवसायों और एशियाई और अफ्रीकी देशों के श्रम बल की श्रृंखला कमजोर पड़ती है तो लंबी अवधि में  संभवतः वैश्विक अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता घट जाएगी। इसके बदलने से वर्तमान अंतरराष्ट्रीय प्रणाली बड़े दबाव में आ जाएगी। जो साफ तौर पर पश्चिमी विकसित देशों के पक्ष में झुकी हुई है। वैश्विक अर्थव्यवस्था का यह जोखिम विशेष रूप से विकासशील देशों, आर्थिक रूप से कमजोर श्रमिकों और गरीब लोगों के एक बड़े हिस्से के लिए बहुत अच्छा साबित हो सकता है। इससे उनके लिये नई संभावनाओं और अवसरों का मार्ग खुल सकता है।

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