प्रकृति की नाराजगी :महाप्रलय की आहट
डी.एन.कुशवाहा, जिला प्रवक्ता पी.एस.ए सह पत्रकार प्रेस परिषद् जिलाध्यक्ष पूर्वी चंपारण की रिपोर्ट-
विश्व पर्यावरण दिवस पर देश विदेश तक तरह-तरह के पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्यक्रम हुए।जिसमें कुछ सार्थक तथा कुछ निरर्थक। निरर्थक यानी प्रचार भर के लिए। जबकि हकीकत में यह मुद्दा बेहद संगीन, गंभीर एवं महाप्रलयंकारी तथा मानवता विनाशक है। "विश्व पर्यावरण दिवस" पर विश्व को प्रदूषण की जानलेवा चुनौती को समवेत रूप में संगीनता के साथ स्वीकार करना चाहिए। समय नहीं है और पानी सर के ऊपर से बहने लगा है। जीवन बचना मुश्किल है।उक्त बातें प्रेस वार्ता के दौरान अर्जुन भारतीय ,सदस्य, हिंदी सलाहकार समिति, केंद्रीय कृषि मंत्रालय.(भारत सरकार) ने बुधवार को कही। आगे उन्होंने कहा की बढ़ते प्रदूषण के कारण तापमान में निरंतर वृद्धि हो रही है। इससे भी प्रकृति खफा है। ऊपर से प्रकृति के साथ सीधे छेड़छाड़ उत्प्रेरक की भूमिका में है। तभी तो प्रकृति देश में और दुनिया में तरह तरह के विनाशकारी रंगरूप का प्रदर्शन कर रही है। अप्रैल महीने में 24 तारीख को आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में प्रकृति का वह गुस्सा आसमान पर दिखा और आंधी- तूफान तथा बरसा आई थी। महज 13 घंटे में 30000 बार आकाश बिजली गिरी। शुक्र था कि उस महाविनाश के 13 घंटों में सिर्फ 15 लोग ही मरे। लेकिन उस महान विनाशकारी लम्हों से आज भी उस क्षेत्र के लोग सहमें व डरे हुए हैं। हल्की आंधी- वर्षा से ही कपकपी पैदा हो जाती है। बादल का गरजना- चमकना ही लोगों में दहशत तथा खौफ भर देता है। ऐसा खौफनाक मंजर था उस रोज आंध्र के तटीय क्षेत्रों में।जो कभी न भूलने वाला मंजर है। उसकी याद से ही उस क्षेत्र के लोग सहम जाते हैं। क्षेत्र के बुजुर्ग से बुजुर्ग लोग भी कहते हैं कि वैसा महाप्रलयकारी आकाश बिजली का गिरना न सुने थे और न देखे थे।
प्रदूषण एवं तापमान के बढ़ते जाने से तरह-तरह के संकट विकराल रूप में खड़े होते जा रहे हैं। पृथ्वी भी तेजी से गर्म हो रही है। इस साल जाड़े के दिनों में जब कुछ ज्यादा सर्दी पड़ रही थी ,तब पृथ्वी 170 वर्षों बाद सर्वाधिक गरम हुई थी। यूं भी आकाश बिजली (ठनका)के गिरने में निरंतर वृद्धि हो रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान 1 डिग्री बढ़ने पर आकाशीय बिजली गिरने का प्रतिशत 12 गुना बढ़ता है। और तापमान? प्रतिवर्ष एक से डेढ़ डिग्री बढ़ रहा है। महाप्रलय का यह दूसरा पहलू है। दुनिया का सर्वाधिक समृद्ध राष्ट्र अमेरिका 1 साल से प्रकृति की मार से तंग -तबाह हो रहा है। यह हाल किसी एक देश का नहीं। किसी एक क्षेत्र का नहीं ।पूरी दुनिया का है। जाड़े के दिनों में बारिश। तो कहीं बाढ़? वर्षा के दिनों में सुखाड़? सब कुछ उल्टा- पुल्टा व अजब- गजब रूप है। वहीं गर्मी में बर्फबारी? प्रदूषण तथा तापमान के कारण पूरी दुनिया मौत के मुंह में समाने के समीप तेजी के साथ पहुंचती जा रही है। प्रदूषण तथा बढ़ते तापमान का मुख्य कारण प्रकृति के नाराज होना है। ऊपर से प्रकृति के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं भी तेज होती जा रही हैं। इस वजह से पृथ्वी का गुस्सा भी तेज होता जा रहा है।बारिश की मात्रा घट रही है। जिन क्षेत्रों में अतिवृष्टि होती थी ,वहां अनावृष्टि हो रही है। दुनिया के अनेक हिस्सों में धरती के अंदर के पानी का स्तर घट रहा है। जो देश के अधिकांश हिस्सों में देखने को मिल रहा है। ताजा स्थिति में बर्फ से आच्छादित रहने वाला हिमांचल बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान है। ऐसा संकट देश के बहुसंख्यक हिस्सों में है। प्रदूषण तथा बढ़ते तापमान के कारण मानव शरीर बीमार हो रहे हैं। क्रोध व चिड़चिड़ापन के शिकार बन रहे हैं।सहनशीलता मिट रही है। बेईमानी बढ़ रही है और ईमानदारी कमजोर हो रही है।व्यभिचार बढ़ रहा है। चरित्र और आचरण कमजोर पड़ते जा रहे हैं। आदमी में जानवर का चेहरा दिखने लगा है। तभी तो डेढ़ साल ,2 साल ,4 साल ,5 साल की नन्हीं बच्चियों के साथ भी दरिंदगी की घटनाएं निरंतर उजागर हो रही हैं। राक्षसी वृति? पागलपन की पराकाष्ठा?? हमारी प्रार्थना है कि भगवान बचावे इस दुनिया को। हम तो विनाशक बन गए हैं? शिवम!

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