गांवों की मुरझाती शिक्षा: शहरों की चमचमाती शिक्षा:-अर्जुन भारतीय
गांवों की मुरझाती शिक्षा: शहरों की चमचमाती शिक्षा:-अर्जुन भारतीय
डी.एन.कुशवाहा जिला प्रवक्ता पीएसए व पत्रकार प्रेस परिषद् जिलाध्यक्ष पूर्वी चंपारण
रामगढ़वा:आजादी मिलने के बाद से देश में दो देश बन रहा है । एक गांव का देश, दूसरा शहरों का देश ।जैसे -जैसे आजादी के दिन बीतते गए हैं। वैसे -वैसे गांव और शहरों के बीच विभेद की खाई बढ़ती गई है । उक्त बातें अर्जुन भारतीय ,सदस्य हिंदी सलाहकार समिति कृषि कल्याण मंत्रालय ने सोमवार को एक भट वार्ता के दौरान कही। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत में आर्थिक स्तर पर और शिक्षा के स्तर पर आज देश के भीतर दो देश हैं। एक देश भारत है ,जिससे गांव और गरीब जुड़े हैं। दूसरा देश है शहर ,जिससे ज्यादातर समृद्ध लोग जुड़े हैं।भारत में पढ़ाई भी अलग-अलग है । शहर की पढ़ाई अलग व गांवों की अलग। भारत की पढ़ाई व्यवस्था चरमराई हुई है और इंडिया की व्यवस्था चमक रही है। इस बदकिस्मती की शुरुआत आजादी मिलने के साथ ही शुरू हो गई। बड़े शहरों में ईसाई मिशनरियों के द्वारा बड़े-बड़े स्कूल और महाविद्यालय स्थापित हुए । इसमें बड़े घरानों के लड़के पढ़ने लगे । यह विद्यालय पटना से लेकर मुंबई तक ,दिल्ली से लेकर मद्रास तक यानी हर बड़े शहरों में आलीशान बिल्डिंगों में चलने लगे । शिक्षा के बीच खाई बढ़ने लगी। लेकिन इन अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों - महाविद्यालयों में सिर्फ धनाढ घरों के लड़के- लड़कियों के लिए जगह थी और आज भी है। इन विद्यालयों -महाविद्यालयों में नए अंग्रेज( भारतीय )पैदा होने लगे।व बदस्तूर पैदा हो रहे हैं। इन विद्यार्थियों में अंग्रेजी सोच भी है और रहन-सहन भी। यह सब इंडिया के हैं। इनके संस्कार और संस्कृति से इंडिया मजबूत तथा धनवान बना है। आजादी के बाद इन विद्यालयों- महाविद्यालयों की संख्या शुरू में बड़े शहरों तक सीमित थी। तब डॉक्टर राम मनोहर लोहिया "सब की शिक्षा एक समान "के लिए आंदोलन चला रहे थे। उनके आंदोलन के नारों से देश गुंजायमान बन रहा था। लेकिन बदकिस्मती ,साठ का दशक पूरा होते-होते डॉक्टर लोहिया इस दुनिया से विदा हो गए। "सब की शिक्षा एक समान" का नारा कमजोर पड़ गया। शिक्षा -समानता की लड़ाई कालांतर में लगभग समाप्त हो गई। दूसरी तरफ, प्राइवेट अंग्रेजी स्कूलों की संख्या बड़े शहरों से अलग, छोटे शहरों तक फैलने लगी ।आज तो छोटे बाजारों और कस्बों में प्राइवेट अंग्रेजी स्कूल "कुकुरमुत्ते" की तरफ फैले हुए हैं और फल फूल रहे हैं।ऐसा इसलिए हुआ है कि 70 के दशक तक गांव से शहर तक के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर ऊंचा था। गुणवतापूर्ण था। 80 के दशक शुरू होते ही सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में घुन लग गया। आज तो हालत यह है कि जिसके पास पैसे नहीं है, वही लोग सरकारी विद्यालयों में अपने घर के बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते हैं/ तनिक भी आर्थिक रूप से जो लोग मजबूत हैं ,वे सभी लोग सरकारी स्कूलों को "सलाम" करके अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ाना माकूल समझते हैं। इस तरह गांव -गरीबों की पढ़ाई रोज-रोज मुरझाती जा रही है और गांव -गरीबों के घर के बच्चे के चेहरे भी। बड़े -छोटे शहरों एवं महानगरों में रहने वाले लोगों, खासकर धनाढ् लोगों ,बड़े नौकर शाहों तथा बड़े राजनेताओं के घरों के बच्चों की पढ़ाई चमचमाती जा रही है । उन घरानों के बच्चे के चेहरे की चमक भी चहचहा रही है। उन घरानों के बच्चे को एक अवसर अलग से भी प्राप्त है ।वह है, विदेशों में लाखों -करोड़ों रुपए खर्च कर पढ़ाई करने का अवसर। यह सौभाग्य ,गांव के गरीब लोगों के बच्चे को कहां नसीब होने वाला है ?
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| अर्जुन भारतीय,सदस्य हिंदी सलाहकार समिति कृषि कल्याण मंत्रालय की फाइल फोटो |
रामगढ़वा:आजादी मिलने के बाद से देश में दो देश बन रहा है । एक गांव का देश, दूसरा शहरों का देश ।जैसे -जैसे आजादी के दिन बीतते गए हैं। वैसे -वैसे गांव और शहरों के बीच विभेद की खाई बढ़ती गई है । उक्त बातें अर्जुन भारतीय ,सदस्य हिंदी सलाहकार समिति कृषि कल्याण मंत्रालय ने सोमवार को एक भट वार्ता के दौरान कही। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत में आर्थिक स्तर पर और शिक्षा के स्तर पर आज देश के भीतर दो देश हैं। एक देश भारत है ,जिससे गांव और गरीब जुड़े हैं। दूसरा देश है शहर ,जिससे ज्यादातर समृद्ध लोग जुड़े हैं।भारत में पढ़ाई भी अलग-अलग है । शहर की पढ़ाई अलग व गांवों की अलग। भारत की पढ़ाई व्यवस्था चरमराई हुई है और इंडिया की व्यवस्था चमक रही है। इस बदकिस्मती की शुरुआत आजादी मिलने के साथ ही शुरू हो गई। बड़े शहरों में ईसाई मिशनरियों के द्वारा बड़े-बड़े स्कूल और महाविद्यालय स्थापित हुए । इसमें बड़े घरानों के लड़के पढ़ने लगे । यह विद्यालय पटना से लेकर मुंबई तक ,दिल्ली से लेकर मद्रास तक यानी हर बड़े शहरों में आलीशान बिल्डिंगों में चलने लगे । शिक्षा के बीच खाई बढ़ने लगी। लेकिन इन अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों - महाविद्यालयों में सिर्फ धनाढ घरों के लड़के- लड़कियों के लिए जगह थी और आज भी है। इन विद्यालयों -महाविद्यालयों में नए अंग्रेज( भारतीय )पैदा होने लगे।व बदस्तूर पैदा हो रहे हैं। इन विद्यार्थियों में अंग्रेजी सोच भी है और रहन-सहन भी। यह सब इंडिया के हैं। इनके संस्कार और संस्कृति से इंडिया मजबूत तथा धनवान बना है। आजादी के बाद इन विद्यालयों- महाविद्यालयों की संख्या शुरू में बड़े शहरों तक सीमित थी। तब डॉक्टर राम मनोहर लोहिया "सब की शिक्षा एक समान "के लिए आंदोलन चला रहे थे। उनके आंदोलन के नारों से देश गुंजायमान बन रहा था। लेकिन बदकिस्मती ,साठ का दशक पूरा होते-होते डॉक्टर लोहिया इस दुनिया से विदा हो गए। "सब की शिक्षा एक समान" का नारा कमजोर पड़ गया। शिक्षा -समानता की लड़ाई कालांतर में लगभग समाप्त हो गई। दूसरी तरफ, प्राइवेट अंग्रेजी स्कूलों की संख्या बड़े शहरों से अलग, छोटे शहरों तक फैलने लगी ।आज तो छोटे बाजारों और कस्बों में प्राइवेट अंग्रेजी स्कूल "कुकुरमुत्ते" की तरफ फैले हुए हैं और फल फूल रहे हैं।ऐसा इसलिए हुआ है कि 70 के दशक तक गांव से शहर तक के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर ऊंचा था। गुणवतापूर्ण था। 80 के दशक शुरू होते ही सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में घुन लग गया। आज तो हालत यह है कि जिसके पास पैसे नहीं है, वही लोग सरकारी विद्यालयों में अपने घर के बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते हैं/ तनिक भी आर्थिक रूप से जो लोग मजबूत हैं ,वे सभी लोग सरकारी स्कूलों को "सलाम" करके अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ाना माकूल समझते हैं। इस तरह गांव -गरीबों की पढ़ाई रोज-रोज मुरझाती जा रही है और गांव -गरीबों के घर के बच्चे के चेहरे भी। बड़े -छोटे शहरों एवं महानगरों में रहने वाले लोगों, खासकर धनाढ् लोगों ,बड़े नौकर शाहों तथा बड़े राजनेताओं के घरों के बच्चों की पढ़ाई चमचमाती जा रही है । उन घरानों के बच्चे के चेहरे की चमक भी चहचहा रही है। उन घरानों के बच्चे को एक अवसर अलग से भी प्राप्त है ।वह है, विदेशों में लाखों -करोड़ों रुपए खर्च कर पढ़ाई करने का अवसर। यह सौभाग्य ,गांव के गरीब लोगों के बच्चे को कहां नसीब होने वाला है ?

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