राष्ट्रपिता गांधी को एक श्रद्धांजलि ! अर्जुन भारतीय
राष्ट्रपिता गांधी को एक श्रद्धांजलि ! अर्जुन भारतीय
रामगढ़वा से डी.एन.कुशवाहा की रिपोर्ट-
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी आज से 70 साल पहले आज ही के दिन हमारे बीच से विदा हुए थे ।उनकी 70 वीं पुण्यतिथि पर पूरा राष्ट्र नम आंखों से आज उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है ।उनके निधन के बाद पूरा राष्ट्र शोक में डूबा था ,और आवाम फूट-फूट कर रोया था ।उनके जाने के गम में तब प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने राष्ट्र के नाम जो संदेश दिया ,वह पंडित नेहरु के जीवन काल का सबसे जज्बाती ,हृदय- स्पर्शी एवं प्रभावशाली सर्वाधिक मशहूर संबोधन माना जाता है ।नेहरू ने स्तब्धता में सराबोर होकर संदेश में राष्ट्र को कहा कि राष्ट्र की रोशनी बुझ गई और अंधेरे का प्रादुर्भाव हो गया ।"फादर ऑफ नेशन" के जाने से आजादी के सपने चूर -चूर हो गए'।पंडित नेहरू ने उक्त राष्ट्र- संदेश में आजादी मिलने के पहली बार गांधी को "फादर ऑफ नेशन" से संबोधित किया,जब देश गुलाम था । जब द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई थी उस वक्त विदेश से 'आजाद हिंद फौज "के माध्यम से नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजादी की लड़ाई का पैगाम दे रहे थे और अंग्रेजों का छक्का भी छुड़ा रहे थे। उसी वक्त नेताजी सुभाष ने सिंगापुर में एक प्रभावशाली संबोधन किया था और उसमें गांधी को पहली बार 'फादर ऑफ नेशन "के नाम से पुकारा था।वह कड़ी पंडित नेहरू ने गांधी के निधन के बाद "फादर ऑफ नेशन "के संबोधन से दोहराई। गांधी के जाने से राष्ट्र कई मायने में चौराहे पर अटक गया,।अंग्रेजो के खिलाफ1857 से जारी आजादी की लड़ाई में कई उतार-चढ़ाव आए ।1885 के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आजादी की लड़ाई को अनेक मुकाम पर पहुंचाया । नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अलग से लड़ाई को बड़ी ताकत दी । युवाओं का क्रांतिकारी दल के पंडित चंद्रशेखर आजाद, शहीदे आजम सरदार भगत सिंह ,राजगुरु ,सुखदेव , यतींद्रनाथ दास ,दुर्गा भाभी ,अशफाक उल्ला खान, खुदीराम बोस जैसे नौजवानों ने अंग्रेजो के हौसले को पस्त बना दिया ।लेकिन वास्तविक ताकत गांधी के दक्षिण अफ्रीका आंदोलन से लौटने के बाद आजादी की लड़ाई को प्राप्त हुई। चंपारण सत्याग्रह आंदोलन ने तो गांधी को और अधिक ऊर्जावान बना दिया।चंपारण -सत्याग्रह की सफलता को आसमान की ऊंचाई मिल गई ।गांधी के सत्याग्रह -शस्त्र -अस्त्र से पूरा देश अवगत ही नहीं हुआ ,बल्कि देश नए सिरे से जग गया ।अंग्रेजों की बेचैनी आसमान चढ़ी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता का संकल्प लिया गया और आजादी के लिए 1 साल का समय अंग्रेज शासकों को दिया गया। उसी दिन रावी नदी के तट पर आधी रात में धूमधाम के साथ स्वाधीनता दिवस का आयोजन किया गया और झंडोत्तोलन हुआ।इस सब के बावजूद आजादी प्राप्त होने में 18 साल का समय लगा।15 अगस्त 1947 को आजादी तो मिल गई। लेकिन 6 महीना पूरा होते ही राष्ट्रपिता गांधी की हत्या कर दी गई और देश बहुत हद तक दिशाहीन हो गया।गांधी इंग्लैंड से बैरिस्टर बनकर लौटे और दक्षिण अफ्रीका में वकालत के साथ -साथ जुल्मों सितम के खिलाफ उन्होंने बहुत गंभीर आंदोलन चलाया और जब भारत लौटे तब यहां आजादी की लड़ाई में तल्लीन हो गए। चंपारण तथा देश के दूसरे हिस्सों में गरीबी के आलम को देख कर गांधी फकीर की तरह रहने लगे। कोट -पैंट उतर गया। शरीर पर सिर्फ एक धोती रह गई।आधा पहनने तथा आधा हिस्सा शरीर ढकने के लिए।गोली लगने के वक्त तक वही धोती। काश ! वह फकीर आज जिंदा होता? राष्ट्रपिता गांधी के स्मृति- चरणों में हमारा नमन! श्रद्धांजलि !!-अर्जुन भारतीय, सदस्य, हिंदी सलाहकार समिति, केंद्रीय कृषि मंत्रालय.
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| अर्जुन सिंह भारतीय ,सदस्य, हिंदी सलाहकार समिति एवं कृषि कल्याण मंत्रालय भारत सरकार |
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी आज से 70 साल पहले आज ही के दिन हमारे बीच से विदा हुए थे ।उनकी 70 वीं पुण्यतिथि पर पूरा राष्ट्र नम आंखों से आज उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है ।उनके निधन के बाद पूरा राष्ट्र शोक में डूबा था ,और आवाम फूट-फूट कर रोया था ।उनके जाने के गम में तब प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने राष्ट्र के नाम जो संदेश दिया ,वह पंडित नेहरु के जीवन काल का सबसे जज्बाती ,हृदय- स्पर्शी एवं प्रभावशाली सर्वाधिक मशहूर संबोधन माना जाता है ।नेहरू ने स्तब्धता में सराबोर होकर संदेश में राष्ट्र को कहा कि राष्ट्र की रोशनी बुझ गई और अंधेरे का प्रादुर्भाव हो गया ।"फादर ऑफ नेशन" के जाने से आजादी के सपने चूर -चूर हो गए'।पंडित नेहरू ने उक्त राष्ट्र- संदेश में आजादी मिलने के पहली बार गांधी को "फादर ऑफ नेशन" से संबोधित किया,जब देश गुलाम था । जब द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई थी उस वक्त विदेश से 'आजाद हिंद फौज "के माध्यम से नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजादी की लड़ाई का पैगाम दे रहे थे और अंग्रेजों का छक्का भी छुड़ा रहे थे। उसी वक्त नेताजी सुभाष ने सिंगापुर में एक प्रभावशाली संबोधन किया था और उसमें गांधी को पहली बार 'फादर ऑफ नेशन "के नाम से पुकारा था।वह कड़ी पंडित नेहरू ने गांधी के निधन के बाद "फादर ऑफ नेशन "के संबोधन से दोहराई। गांधी के जाने से राष्ट्र कई मायने में चौराहे पर अटक गया,।अंग्रेजो के खिलाफ1857 से जारी आजादी की लड़ाई में कई उतार-चढ़ाव आए ।1885 के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आजादी की लड़ाई को अनेक मुकाम पर पहुंचाया । नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अलग से लड़ाई को बड़ी ताकत दी । युवाओं का क्रांतिकारी दल के पंडित चंद्रशेखर आजाद, शहीदे आजम सरदार भगत सिंह ,राजगुरु ,सुखदेव , यतींद्रनाथ दास ,दुर्गा भाभी ,अशफाक उल्ला खान, खुदीराम बोस जैसे नौजवानों ने अंग्रेजो के हौसले को पस्त बना दिया ।लेकिन वास्तविक ताकत गांधी के दक्षिण अफ्रीका आंदोलन से लौटने के बाद आजादी की लड़ाई को प्राप्त हुई। चंपारण सत्याग्रह आंदोलन ने तो गांधी को और अधिक ऊर्जावान बना दिया।चंपारण -सत्याग्रह की सफलता को आसमान की ऊंचाई मिल गई ।गांधी के सत्याग्रह -शस्त्र -अस्त्र से पूरा देश अवगत ही नहीं हुआ ,बल्कि देश नए सिरे से जग गया ।अंग्रेजों की बेचैनी आसमान चढ़ी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता का संकल्प लिया गया और आजादी के लिए 1 साल का समय अंग्रेज शासकों को दिया गया। उसी दिन रावी नदी के तट पर आधी रात में धूमधाम के साथ स्वाधीनता दिवस का आयोजन किया गया और झंडोत्तोलन हुआ।इस सब के बावजूद आजादी प्राप्त होने में 18 साल का समय लगा।15 अगस्त 1947 को आजादी तो मिल गई। लेकिन 6 महीना पूरा होते ही राष्ट्रपिता गांधी की हत्या कर दी गई और देश बहुत हद तक दिशाहीन हो गया।गांधी इंग्लैंड से बैरिस्टर बनकर लौटे और दक्षिण अफ्रीका में वकालत के साथ -साथ जुल्मों सितम के खिलाफ उन्होंने बहुत गंभीर आंदोलन चलाया और जब भारत लौटे तब यहां आजादी की लड़ाई में तल्लीन हो गए। चंपारण तथा देश के दूसरे हिस्सों में गरीबी के आलम को देख कर गांधी फकीर की तरह रहने लगे। कोट -पैंट उतर गया। शरीर पर सिर्फ एक धोती रह गई।आधा पहनने तथा आधा हिस्सा शरीर ढकने के लिए।गोली लगने के वक्त तक वही धोती। काश ! वह फकीर आज जिंदा होता? राष्ट्रपिता गांधी के स्मृति- चरणों में हमारा नमन! श्रद्धांजलि !!-अर्जुन भारतीय, सदस्य, हिंदी सलाहकार समिति, केंद्रीय कृषि मंत्रालय.

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