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बिहार में कबाड़ बनी प्राथमिक शिक्षा :- अर्जुन भारतीय

*बिहार में  कबाड़ बनी प्राथमिक शिक्षा 

* प्रारंभिक बेश के अभाव के कारण बर्बाद हो रहा है बच्चों का भविष्य

*विगत मैट्रिक व इंटर की परीक्षा व कौपी जाँच केन्द्रों पर लगे सीसीटीवी केमरों ने खोली शिक्षा की पोल
अर्जुन सिंह भारतीय ,सदस्य, हिंदी सलाहकार समिति एवं किसान कल्याण मंत्रालय भारत सरकार
रामगढ़वा से डी.एन.कुशवाहा की रिपोर्ट-
रामगढ़वा-बिहार की गिरती शिक्षा व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए  अर्जुन भारतीय, सदस्य ,हिंदी सलाहकार समिति ,केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार
ने बुधवार को एक प्रेस वार्ता के दौरान दैनिक भास्कर संवाददाता को बताया कि पिछले सप्ताह जब केंद्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा  ने बिहार में बहाल पात्रताहीन प्राथमिक शिक्षकों के कारण शिक्षा के खस्ताहाल पर बयान दिया,  तो खासी खलबली मची। मुद्दा  संगीन एवं  गंभीर तो था ही। इस संदर्भ में बिहार के शिक्षा मंत्री श्री वर्मा का बयान भी करीब सकारात्मक ही था। गलतियाँ तो प्रारंभ में ही हुई थी। "शिक्षामित्र" के नाम पर प्राथमिक विद्यालयों में बहाली का कमान मुख्य रुप से प्रत्येक पंचायतों में मुखिया  लोगों के हाथों में दे दी गई। जबकि चुनाव के पूर्व मुखिया पद के लिए शिक्षा की कोई भी अहर्ता निर्धारित नहीं की गई जिसका नतिजा हुआ कि अनपढ़ गवार लोग भी मुखिया बन गए।उसमें कुछ पढ़े लिखे लोग भी मुखिया बने। लेकिन रिश्वत ने उनके आँख पर पट्टी लगा दिया और क्वालिटी का परीक्षण किए बगैर हमलोगों ने पैसे लेकर नंबर के आधार पर या कही-कही नियम-कानून को ताक पर रखकर ऐसे शिक्षकों की बहाली कर दिया जिनको बच्चों को पढ़ाने के लायक कुछ भी नहीं आता है। जिसका खामियाजा आज बिहार के अभिभावको एवं बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। विभागीय अधिकारियों की परोक्ष -अपरोक्ष मदद से एक, दो और फिर ,तीन लाख  रुपए  में  एक -एक शिक्षक की बहाली की गई। ज्यादातर मुखिया करोड़पति बन गए। अनिवार्यता के बावजूद मुखियों ने शिक्षक अभ्यर्थियों के लिए  दो -दो रजिस्टर रखा। एक असली, और दूसरा नकली।चालाकी यह थी कि नकली पर तमाम अभ्यर्थियों का हस्ताक्षर हो तथा असली पर सिर्फ नकली -असली  उन अभ्यर्थियों का हस्ताक्षर, जिन्हें निश्चित रूप से बहाल करना है । यही खेल हुआ फाइनल बहाली में नकली रजिस्टर हटा दिया गया व असली रख लिया गया । वह असली भी नकली ही था। ऐसे -ऐसे  अभ्यर्थी ,शिक्षक बहाल हुए ,जिनके सर्टिफिकेट बिल्कुल फर्जी थे। इतना ही नहीं, उनमें से अनेक शिक्षक व शिक्षिकाओं को को अपना हस्ताक्षर करने भी नहीं आता था । बहाली के बाद उन लोगों ने हस्ताक्षर करना तथा क ख ग पढ़ना सीखा। अफरा -तफरी मची रही । अभ्यर्थी शिकायतें लेकर प्रखंड से लेकर अनुमंडल तक ,फिर जिला मुख्यालय तक दौड़ते रहे । फिर भी कोई सार्थक नतीजा नहीं निकला । बड़ी संख्या मे अभ्यर्थी हताश- निराश होकर बैठ गए। कुछ प्राधिकरण के गठन के बाद भी दौड़ते रहे । इसमें कुछ हटाए गए और कुछ बहाल हुए। उसमें भी बहुत बड़ा खेल हुआ। फिर मामला उच्च न्यायालय, पटना तक पहुंचा ।वहाँ से निगरानी जाँच का आदेश हुआ व
 जाँच शुरू हुई ,जो आज भी चल रही है।इस मामले में बीच-बीच में उच्च न्यायालय ने फटकार भी लगाई । उक्त जाँच कछुआ की गति से हो रही है। इस तरह बिहार में बहाल  ढाई-तीन लाख शिक्षकों के कारण बहुत हद तक शिक्षा कबाड़ बन गई है। देखिए, उच्च न्यायालय के जाँच- आदेश की अंतिम परिणति किस रूप में और कब तक पूरी होती है ?--

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