पूर्वी चम्पारण:बदहाली का शिकार है रामगढ़वा बाजार का सर्वहितैषी पुस्तकालय,बना शराबियो का अड्डा
*बदहाली का शिकार है रामगढ़वा बाजार का सर्वहितैषी पुस्तकालय*
*रामगढ़वा का यह अद्वितीय पुस्तकालय इन दिनों गाय, भैंस, बकरी,आदि का बसेरा बना हुआ है*
*पुस्तकालय के कमरों में शराब की बोतलों को देखकर ऐसा अंदाजा लगाया जा रहा है कि बिहार मद्य निषेध कानून को धता बताते हुए बेखौफ शराबियों के द्वारा पुस्तकालय में पिया जाता है शराब*
चंपारण टुडे रामगढ़वा से डी.एन.कुशवाहा की रिपोर्ट
रामगढ़वा(पूर्वी चम्पारण) - स्थानीय प्रखंड अंतर्गत थाना क्षेत्र के रामगढ़वा बाजार रामजानकी मंदिर के सामने अवस्थित व अंग्रेजी हुकूमत के समय जनवरी 1929 में स्थापित एकमात्र महावीर हितैषी पुस्तकालय आज अपनी बदहाली पर आठ- आठ आंसू बहा रहा है । इस ऐतिहासिक पुस्तकालय के तस्वीर को देखकर ही इसके बदइंतजामी का सहज आकलन किया जा सकता है। पुस्तकालय के अलमीरा में बंद लगभग 2 हजार 500 पुस्तकों को दीमक चाट गए हैं । बंद पड़ी आलमीरा के ताले सन 1992 से ही नहीं खुले हैं। ऐसी स्थिति में पुस्तकालय कहाँ तक सुरक्षित होंगी स्वत: अनुमान लगाया जा सकता है । स्थानीय बाजार के बुद्धिजीवियों एवं शिक्षा प्रेमियों की उदासीनता के कारण आज यह ऐतिहासिक पुस्तकालय मृत हो गया है । इस पुस्तकालय का इतिहास बड़ा ही रोचक है। 1921 में जब गांधी जी का असहयोग आंदोलन चरम पर था, उसी समय गाँधी जी के प्रेरणा से गांव- गांव में राष्ट्रीय विद्यालय खोलकर आमजनों में राष्ट्रभक्ति का भाव जागृत किया जा रहा था। उसी समय रामगढ़वा बाजार के एक शिक्षा प्रेमी एवं गांधी भक्त स्व. सत्यनारायण प्रसाद ने एक राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना के साथ- साथ अपने नाम से श्री सत्य पुस्तकालय की स्थापना की थी। जिसका उद्घाटन तत्कालीन कांग्रेसी नेता रामनाथ ब्रहमचारी तथा बापू महादेव सिंह ने किया था। जो बाबा राम लखन दास जी के रामजानकी मंदिर में चलता आ रहा था । बाद में स्थानीय ऊर्जावान युवकों के द्वारा हिंदी सर्वहितैषी पुस्तकालय का नाम बदलकर सर्वहितैषी पुस्तकालय कर दिया गया । तत्पश्चात स्व. सत्यनारायण प्रसाद के प्रयास से बेतिया राज के तत्कालीन मैनेजर बिपिन बिहारी वर्मा द्वारा 11 धुर जमीन पुस्तकालय के नाम पर 99 वर्ष के लीज पर कर दिया गया । इसी जमीन पर तत्कालीन शिक्षा
मंत्री डॉक्टर सैयद महमूद द्वारा पुस्तकालय भवन निर्माण हेतु न्यू डाली गई तथा ईंट की दीवार पर खपरैल मकान बनाकर पुस्तकालय को चलाया गया । उस समय प्रखंड के एकमात्र व्यक्ति विंदवासिनी शरण साह मंत्री के रूप में पुस्तकालय की देखभाल करते रहे। इसके बाद पुस्तकालय के नियमित पाठक स्व.महावीर प्रसाद ने 1940 में अपने मरणासन्न अवस्था में 2 हजार 100 रुपये सहयोग राशि दिए जो उस समय के अनुसार बहुत बड़ी रकम थी ।स्व. महावीर प्रसाद द्वारा किए गए दान के मद्देनजर रखते हुए तत्कालीन कमेटी ने इसका नामकरण श्री महावीर सर्वहितैषी पुस्तकालय कर दिया।जो मृत दीवारों पर आज भी दिख रहा है । जिस हौसले एवं उत्साह के साथ यह पुस्तकालय चलाया गया था, आज वहीं पुस्तकालय अपने दूर्दिन पर आंसू बहा रहा है । इस पुस्तकालय की दयनीय स्थिति से मर्माहत शिक्षाविद एवं रामगढ़वा के सामाजिक कार्यकर्ता बृजेश गुप्ता ने बताया कि सन् 1992 में पुस्तकालय संचालन समिति का चुनाव हुआ था। जिसमें पदाधिकारी के रूप में बड़े दबदबा रखने वाले लोग पदासीन हुए । परंतु चुनाव के पश्चात ना तो पुस्तकालय की अलमीरा खुली और ना ही उधर ताक-झांक भी करने वाला कोई मिला ।आज उस पुस्तकालय की स्थिति यह है कि वहाँ गाय, बकरी, सुअर और भैंसों का रैन बसेरा बना हुआ है।इन दिनों इस पुस्तकालय में इलाके के रूई धुनाई करने वाले धुनिया दिन भर तोसक,रजाई बनाने का काम कर रहे हैं। वहीं पुस्तकालय की कमरे में शराब की बोतलों को देखकर यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि बेखौफ शराबियों द्वारा बिहार मध निषेध कानून को धता बताते हुए यहां छुपकर शराब पिया जाता है। जिसकी भनक तक स्थानीय प्रशासन को नहीं है। इस पुस्तकालय की दुर्दशा को देखकर जिन पूर्वजों ने इस पुस्तकालय को संवारा एवं सिंचा, उनकी आत्मा भी रो रही होंगी। पता नहीं इस पुस्तकालय का दूर्दिन कब हटेगा और अब इसका कायाकल्प होगा भी या नहीं। यहां के बुद्धिजीवियों एवं शिक्षाविद नागरिकों के समक्ष
यह चुनौती बनी है।
*रामगढ़वा का यह अद्वितीय पुस्तकालय इन दिनों गाय, भैंस, बकरी,आदि का बसेरा बना हुआ है*
*पुस्तकालय के कमरों में शराब की बोतलों को देखकर ऐसा अंदाजा लगाया जा रहा है कि बिहार मद्य निषेध कानून को धता बताते हुए बेखौफ शराबियों के द्वारा पुस्तकालय में पिया जाता है शराब*
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| रामगढ़वा का बेसहारा व उपेक्षित महावीर सर्वहितैषी पुस्तकालय |
रामगढ़वा(पूर्वी चम्पारण) - स्थानीय प्रखंड अंतर्गत थाना क्षेत्र के रामगढ़वा बाजार रामजानकी मंदिर के सामने अवस्थित व अंग्रेजी हुकूमत के समय जनवरी 1929 में स्थापित एकमात्र महावीर हितैषी पुस्तकालय आज अपनी बदहाली पर आठ- आठ आंसू बहा रहा है । इस ऐतिहासिक पुस्तकालय के तस्वीर को देखकर ही इसके बदइंतजामी का सहज आकलन किया जा सकता है। पुस्तकालय के अलमीरा में बंद लगभग 2 हजार 500 पुस्तकों को दीमक चाट गए हैं । बंद पड़ी आलमीरा के ताले सन 1992 से ही नहीं खुले हैं। ऐसी स्थिति में पुस्तकालय कहाँ तक सुरक्षित होंगी स्वत: अनुमान लगाया जा सकता है । स्थानीय बाजार के बुद्धिजीवियों एवं शिक्षा प्रेमियों की उदासीनता के कारण आज यह ऐतिहासिक पुस्तकालय मृत हो गया है । इस पुस्तकालय का इतिहास बड़ा ही रोचक है। 1921 में जब गांधी जी का असहयोग आंदोलन चरम पर था, उसी समय गाँधी जी के प्रेरणा से गांव- गांव में राष्ट्रीय विद्यालय खोलकर आमजनों में राष्ट्रभक्ति का भाव जागृत किया जा रहा था। उसी समय रामगढ़वा बाजार के एक शिक्षा प्रेमी एवं गांधी भक्त स्व. सत्यनारायण प्रसाद ने एक राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना के साथ- साथ अपने नाम से श्री सत्य पुस्तकालय की स्थापना की थी। जिसका उद्घाटन तत्कालीन कांग्रेसी नेता रामनाथ ब्रहमचारी तथा बापू महादेव सिंह ने किया था। जो बाबा राम लखन दास जी के रामजानकी मंदिर में चलता आ रहा था । बाद में स्थानीय ऊर्जावान युवकों के द्वारा हिंदी सर्वहितैषी पुस्तकालय का नाम बदलकर सर्वहितैषी पुस्तकालय कर दिया गया । तत्पश्चात स्व. सत्यनारायण प्रसाद के प्रयास से बेतिया राज के तत्कालीन मैनेजर बिपिन बिहारी वर्मा द्वारा 11 धुर जमीन पुस्तकालय के नाम पर 99 वर्ष के लीज पर कर दिया गया । इसी जमीन पर तत्कालीन शिक्षा
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| पुस्तकालय के कमरे में बिखरे हुए इन शराब की बोतलों को देखकर यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन दिनों रामगढ़वा का यह ऐतिहासिक पुस्तकालय शराबियो का अड्डा बना हुआ है |
यह चुनौती बनी है।


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