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उपेक्षित हैं कारगिल शहीद अरविंद पांडे के परिजन ,18 वर्ष बाद भी नहीं बने शहीद के स्मारक

*उपेक्षित हैं कारगिल शहीद अरविंद पांडे के परिजन ,18 वर्ष बाद भी नहीं बने शहीद के स्मारक

शहीद अरविंद पांडेय की फाइल फोटो
चंपारण टुडे से   डी.एन.कुशवाहा की रिपोर्ट-
रामगढ़वा -"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ,वतन पर मरने वालों का यहीं बाकी निशा होगा।" ये पत्तियां देश की सुरक्षा में कुर्बान होने वाले अमर शहीद अरविंद पांडे के लिए बेमानी साबित हो रही है ।कारगिल में जब बदनीयत पाकिस्तान की सेना नाटकीय ढंग से आतंकियों के नाम पर प्रवेश कर गई थी, उस समय देश पर बहुत बड़ा संकट का बादल मंडराने लगा था। ये वो अवसर था जब भारतीय जवानों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने आपको न्योछावर कर करने में तनिक भी देर न लगाई। वैसे में भला चंपारण का लाल कैसे अपनी आंखें बंद कर चुप बैढ़ता। कारगिल युद्ध के मोर्चे पर अपनी सेना की टोलियों के साथ दुश्मनों के छक्के छुड़ाते हुए आखिरकार रामगढ़वा थाना क्षेत्र के भटिया गांव निवासी ईश्वर चंद्र पांडे का द्वितीय पुत्र अरविंद पांडे ने अपनी मातृभूमि का कर्ज अदा करते हुए सैकड़ों दुश्मनों को मौत की नींद सुला कर खुद भी हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गया। मरणोपरांत अरविंद पांडे के कमांडर ने उनके पिता को जो संदेश भेजा था उससे प्रमाणित हो गया कि अरविंद दुश्मन फौज के लिए तूफान बन कर आया था और जांबाजी से लड़ते हुए 29 मई 1999 को शहीद हो गया। परिवारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अरविंद पांडे ने अपनी बहन की शादी तय कर दी थी और उसके बाद अपना घर बसाने का अरमान लिए हुए था ।शादी के पहले अरविंद घर तो जरुर पहुंचा लेकिन शहीद होकर तिरंगे कपड़े में लिपटा हुआ। सुबह होते ही उक्त घटना से अनभिज्ञ रामगढ़वा वासियों को देखने को मिला चाहुओर स्थानीय नेताओं ,पुलिस के जवानों एवं अन्य अधिकारियों का काफिला अरविंद के घर तक जाने का रास्ता दुरुस्त करने में जुट गया। इस संबंध में पूछे जाने पर बताया गया कि भटिया का एक जवान अरविंद पांडे कारगिल युद्ध में शहीद हो गया है और उसका शव उसके पैतृक गांव भटिया आ रहा है ।इतने में प्रखंड, अनुमंडल तथा जिले से लोगों का तांता लगने लगा। जैसे ही शहीद अरविंद का शव हेलीकॉप्टर से गांव में आया, वैसे ही गांव सहित पूरे इलाके में मातमी सन्नाटा छा गया और मौके पर बड़े -बड़े नेताओं एवं अधिकारियों का काफिला दौड़ लगाने लगा एवं पीड़ित परिवार, गांव तथा इलाके के लिए आश्वासनों की झड़ी लगाने लगे। लेकिन सभी वादे शहादत के 18 वर्ष बाद तक भी हवा में तैरते नजर आ रहे हैं। नेताओं एवं अधिकारियों के द्वारा तबातोड़ किए गए वादों में उक्त गांव के गरीबों को इंदिरा आवास देने, रामगढ़वा एनएच 28 ए से उनके घर तक पक्की सड़क बनाने एवं स्मारक स्थल के पास विद्यालय बनाने, मीनापुर गांव में आदर्श विद्यालय बनाने ,भटिया गांव का नाम बदलकर अरविंद नगर भटिया करने ,अस्पताल बनाने, बिजली की सुविधा मुहैया कराने तथा लड़कियों के लिए विद्यालय खोलने सहित तमाम घोषणाएं की गई। गांव का नाम तो बदल गया किन्तु सूरत अभी तक नहीं बदली। उपरोक्त वादे तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी व राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने गांव में पहुंचकर हजारों लोगों के समक्ष किए थे। लेकिन सब वादे झूठे निकले ।शहीद अरविंद पांडे के पिता ईश्वर चंद्र पांडे अपनी व्यथा सुनाते हुए बताते हैं कि उनके पुत्र के शहादत के बाद निजी संस्था सहारा इंडिया परिवार के मुखिया सहाराश्री सुब्रत राय ने कारगिल शहीदों के सहयोग के लिए जो घोषणाएं की थी ,वो सभी लाभ मुझे 10 साल तक सहायता राशि के रूप में सम्मान के साथ प्राप्त हो गया। लेकिन सरकार के द्वारा किए गए वादे अभी तक पूरे नहीं हुए ,इससे मुझे काफी दुख है । शहीद अरविंद पांडे के बड़े भाई संजय पांडे ने बताया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई से लेकर मुख्यमंत्री तक के किए गए वादों में लगभग 50% तक पूरे किए गए और 50% वादे फाइलों में दम तोड़ रही हैं ।वहीं इस संबंध में पूर्व सैनिक कल्याण संघ रामगढ़वा के अध्यक्ष लालबाबू सिंह बताते हैं कि हम सैनिक सिर्फ वेतन व पेंशन पाने एवं अपने परिवार का भरण- पोषण करने के लिए ही फौज में भर्ती नहीं होते ,हम फौजियों के दिल में भारत माता की रक्षा करने व दुश्मनों के छक्के छुड़ाने की जज्बा कूट-कूट कर भरी होती है। तभी तो लड़ाई के समय अपनी जान की परवाह किए बगैर भारत माता की रक्षा करते करते हम अपने आप को न्योछावर कर देते हैं । वही काम रामगढ़वा का वीर सपूत शहीद अरविंद पांडे ने किया है ।साथ ही उन्होंने कहा कि तत्कालीन सरकार के द्वारा किए गए वादे को वर्तमान सरकार को हर हाल से पूरी करनी चाहिए। इसे हम फौजियों का मनोबल बढ़ेगा।

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