छपरा में मिला रामायण का जटायु, देखने के लिए लोगों की उमड़ी भीड़।
*बिहार* : छपरा के रसूलपुर थाना क्षेत्र के अतरसन गांव में करीब 30 किलोग्राम वजन और दो मीटर लम्बे पंखों वाला जटायु मिला है। इसे देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी है। जटायु जाति के इस गिद्ध को फिलहाल अतरसन पंचायत के पूर्व मुखिया मदारीचक गांव निवासी रंजीत यादव के संरक्षण में रखा गया है। ग्रामीण सुधाकर यादव ने बताया कि अतरसन गांव के पोखर के पास ये जटायु इमरान खान को मिला।
ये उड़ नहीं सकता था। डॉ नियाज अहमद इस विशालकाय पक्षी की देख-रेख में लगे हैं। बीडीसी सोनू यादव ने बताया कि वन विभाग को सूचना दे दी गई है। जटायु बहुत ही विशाल पक्षी होता है।
रामायण के अनुसार जटायु ने माता सीता को रावण के चंगुल से बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी थी। खुद भगवान राम ने खुद को जटायु का ऋणी कहा था। पुराणों के अनुसार जटायु कश्यप ऋषि के पुत्र थे। उनके भाई का नाम सम्पाती था। जिन्होंने हनुमान को सीता का पता बताया था। वो श्रीराम के पिता दशरथ के मित्र थे उनकी भी दशरथ के समान 60000 साल की आयु थी। छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में गिद्धराज जटायु का मंदिर है। ये वो जगह है जब सीता का अपहरण कर रावण पुष्पक विमान से लंका जा रहा था, तो सबसे पहले जटायु ने ही रावण को रोका था।
राम की राह में जटायु पहले शहीद थे। मान्यता के मुताबिक केरल के दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनिया भर में सिर्फ यही जटायु का एकमात्र मंदिर है। इन सब चीजों के ऐतिहासिक साक्ष्य भी है। लेकिन आस्था और भक्ति को किसी साक्ष्य की जरूरत नहीं पड़ती। जटायु की राम से पहली मुलाकात पंचवटी (नासिक के पास) हुई थी जहां वे रहते थे। लेकिन उनकी मृत्यु दंडकारण्य में हुई। जब जटायु नासिक के पंचवटी में रहते थे तब एक दिन आखेट के समय महाराज दशरथ से उनकी मुलाकात हुई और तभी से वे और दशरथ मित्र बन गए।वनवास के समय जब भगवान श्रीराम पंचवटी में पर्णकुटी बनाकर रहने लगे। तब पहली बार जटायु से उनका परिचय हुआ। भगवान श्रीराम अपने पिता के मित्र जटायु का सम्मान अपने पिता के समान ही करते थे। रावण जब सीताजी का हरण कर लेकर गया तब सीताजी का विलाप सुनकर जटायु ने रावण को रोकने का प्रयास किया। लेकिन अन्त में रावण ने तलवार से उनके पंख काट डाले। जटायु मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़े और रावण सीताजी को लेकर लंका की ओर चला गया। सीता की खोज करते हुए राम जब रास्ते से गुजर रहे थे तो उन्हें घायल अवस्था में जटायु मिले। जटायु मरणासन्न थे। जटायु ने राम को पूरी कहानी सुनाई और यह भी बताया कि रावण किस दिशा में गया है। जटायु के मरने के बाद राम ने उनका वहीं अंतिम संस्कार और पिंडदान किया। इसीलिए भारतीय जनमानस में जटायु को श्रद्धा की नजरों से देखा जाता है।

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