रंगों का महान त्योहार होली का बदलता स्वरूप: नृपेंद्र अभिषेक नृप
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| स्वतंत्र लेखक नृपेंद्र अभिषेक नृप |
हाल के कुछ वर्षों में देख रहे है कि होली का स्वरूप बदलता जा रहा है क्योंकि युवा लोग इसके महत्व को नहीं समझ रहे हैं और इसी सौहार्दपूर्ण त्योहार की जगह है नशे के त्यौहार के रूप में देख रहे हैं। आजकल की युवा होली के दिन तरह-तरह का नशा करके बैठे रहते है कुछ लोगों को तो इसे गंभीर नुकसान भी हो जाते हैं लेकिन वह इसकी परवाह नहीं करते है। इस दिन अब युवाओं में लड़ाई झगड़ा तो आम बात हो गई है। लोग होली के त्यौहार पर दुश्मनी भुलाने की जगह अब दुश्मनी बढ़ाने लगे है। आजकल युवा लोग रंग की जगह गोबर नाली का पानी और पक्के रंगों का इस्तेमाल करते हैं जो कि होली की शोभा को धूमिल करते है। यह सब चीजें होली के त्यौहार की छवि को खराब कर रहे है। अब लोगों को जागरूक होना होगा।
होली एक उत्सव या त्यौहार है जो वास्तव में भारत ही नहीं बल्कि पूर उपमहाद्वीप को अपने रंग में सराबोर करता है। हिन्दुस्तान में जो त्यौहार सही मायनों में गंगा-जमुनी तहजीब को व्यक्त करता है, वह होली ही है।
रंगों का महान त्योहार होली हिन्दू धर्म का विश्व प्रसिद्ध त्योहार बन गया है। मंजीरा, ढोलक, मृदंग की ध्वनि से गूंजता रंगों से भरा होली का त्योहार, फाल्गुन माह के पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली का उत्सव अपने साथ सकारात्मक ऊर्जा लेकर आता है और आसमान में बिखरे गुलाल की तरह ऊर्जा को चारों ओर बिखेर देता है। इस त्यौहार को प्रेम का त्यौहार भी कहा जाता है, क्योंकि जिस दिन सभी लोग अपने गिले-शिकवे भुलाकर दोस्ती कर लेते हैं और पूरे हर्षोल्लास से इस त्योहार को मनाते है। इसे बुराई पर अच्छाई की जीत माना गया और होली त्यौहार का उदय हुआ। होली एक सौहार्दपूर्ण त्यौहार है जिसमें लोग वर्षों पुरानी दुश्मनी लड़ाई झगड़ा भुलाकर एक दूसरे से गले मिल जाते है इसीलिए इस त्यौहार को दोस्ती का भी प्रतीक कहा गया है। इस दिन समाज में कोई ऊंच-नीच नहीं देखता सभी लोग एक दूसरे को गले लगा कर होली का त्यौहार मनाते है।इसे समाज में ऊंच-नीच की खाई कम होती है इसलिए यह त्योहार सामाजिक महत्व भी रखता है।
होली क्यो मनाई जाती है इसके पीछे कुछ पौराणिक कहानियां प्रचलित है । होली का त्यौहार मनाने के पीछे एक प्राचीन इतिहास है। प्राचीन समय में हिरण्यकश्यप नाम के एक असुर हुआ करता था। उसकी एक दुष्ट बहन थी जिसका नाम होलिका था। हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानता था।हिरण्यकश्यप के एक पुत्र थे जिसका नाम प्रह्लाद था। वे भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे। हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु के विरोधी था। उन्होंने प्रह्लाद को विष्णु की भक्ति करने से बहुत रोका। लेकिन प्रह्लाद ने उनकी एक भी बात नहीं सुनी। इससे नाराज़ होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को जान से मारने का प्रयास किया। इसके लिए हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से मदद मांगी। क्योंकि होलिका को आग में न जलने का वरदान मिला हुआ था। उसके बाद होलिका प्रह्लाद को लेकर चिता में बैठ गई लेकिन जिस पर विष्णु की कृपा हो उसे क्या हो सकता है और प्रह्लाद आग में सुरक्षित बचे रहे जबकि होलिका उस आग में जल कर भस्म हो गई। कहा जाता है कि इसी के कारण होली मनाने की परम्परा शूरी हुई।
ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में अगर हम होली के देखते है तो पाते है कि एक बार जब फ्रेंच यात्री बरनियर मुगल सम्राट शाहजहां के दौर में भारत आये थे तो उन्हें इतने सारे लोगों को होली खेलता हुआ देखने पर आश्चर्य हुआ था। ये लोग सभी जातियों व धर्मों और वर्गों से संबंधित थे। यही तो होली की सुन्दरता है। यह सामाजिक भेदभाव को मिटा देती है और लोगों को एक दूसरे के करीब लाती है। मुगल सम्राट अकबर के दरबार के नव रत्नों में से एक अबुल फजल ने लिखा- शहंशाह उस्त ची शुदम अवियार मिन्हाल मुस्तामबीर कब्ल-ए-जश्न-ए-फाम- इसका अर्थ यह है कि बादशाह होली के त्यौहार से बहुत पहले से ही विभिन्न आकारों की पिचकारियां एकत्र करने लगते थे। अकबर केवल अपने दरबारियों के साथ ही होली नहीं खेलते थे बल्कि महल के बाहर के लोगों के साथ भी होली खेलते थे। यह वह दिन था जब एक आम आदमी भी भारत के बादशाह को रंग लगा सकता था। औरंगजेब ने भी न सिर्फ लोगों को सड़कों पर होली खेलने से नहीं रोका बल्कि वह स्वयं भी होली खेलते थे। दरअसल, होली की स्पिरिट को केवल महसूस किया जा सकता है, उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
होली त्योहार की तैयारियां लोग कई दिनों पहले से ही करने लग जाते हैं बाजारों में रंग बिरंगे गुलाल नए कपड़े और मिठाइयां बिकने को आ जाती है। बाजारों में एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है। होली का त्यौहार 2 दिनों तक चलता है होली के पहले दिन संध्या के समय होलिका दहन किया जाता है। सभी लोग होलिका दहन के बाद एक दूसरे को गले मिलकर होली की शुभकामनाएं देते हैं और पूरे मोहल्ले भर में मिठाइयां बांटते है। होली का दूसरा दिन धुलण्डी के रूप में जाना जाता है इस दिन सभी लोग एक दूसरे को रंग-बिरंगे रंग से रंगते है। और पूरे दिन भर रंगो से खेलते है। इस दिन लोग खूब मौज मस्ती करते हैं और नई मिठाईयां खाते है।
होली रंगों और गुलालों के लिए ही जाना जाता है और इसमें हो रही खतरनाक रसायनों के मिलावटी से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इनके उपयोग में सावधानी बरतने की जरूरत है। आजकल अच्छी क्वॉलिटी के रंगों का प्रयोग नहीं होता और त्वचा को नुकसान पहुंचाने वाले रंग खेले जाते हैं। यह सरासर गलत है। इस मनभावन त्योहार पर रासायनिक लेप व नशे आदि से दूर रहना चाहिए। बच्चों को भी सावधानी रखनी चाहिए। बच्चों को बड़ों की निगरानी में ही होली खेलना चाहिए। दूर से गुब्बारे फेंकने से आंखों में घाव भी हो सकता है। रंगों को भी आंखों और अन्य अंदरूनी अंगों में जाने से रोकना चाहिए। यह मस्ती भरा पर्व मिलजुल कर मनाना चाहिए।
जैसे कि हमे पता है कि जल संकट पूरी दुनियां में लगातार बढ़ रहा है और भारत भी इससे अछूता नही है। इसलिए होली खेलते वक्त अनावश्यक जल के उपयोग से बचना चाहिए । वैसे तो होली एक धार्मिक मुद्दा है और सभी को धर्म की स्वतंत्रता के तहत मौलिक अधिकार प्राप्त है लेकिन फिर भी जिस युग मेंहम संपोषणीय विकास की बात कर रहे है और सरकार पर्यावरण को ले कर इतनी सजग है तो भारत का जिम्मेदार नागरिक होने का फर्ज अदा करनी चाहिए जिससे कि हम होलो हर्षोल्लास के साथ तो मनाए ही साथ मे पर्यावरण का भी उचित ख्याल रखे।
हाल के कुछ वर्षों में देख रहे है कि होली का स्वरूप बदलता जा रहा है क्योंकि युवा लोग इसके महत्व को नहीं समझ रहे हैं और इसी सौहार्दपूर्ण त्योहार की जगह है नशे के त्यौहार के रूप में देख रहे हैं। आजकल की युवा होली के दिन तरह-तरह का नशा करके बैठे रहते है कुछ लोगों को तो इसे गंभीर नुकसान भी हो जाते हैं लेकिन वह इसकी परवाह नहीं करते है। इस दिन अब युवाओं में लड़ाई झगड़ा तो आम बात हो गई है। लोग होली के त्यौहार पर दुश्मनी भुलाने की जगह अब दुश्मनी बढ़ाने लगे है। आजकल युवा लोग रंग की जगह गोबर नाली का पानी और पक्के रंगों का इस्तेमाल करते हैं जो कि होली की शोभा को धूमिल करते है। यह सब चीजें होली के त्यौहार की छवि को खराब कर रहे है। अब लोगों को जागरूक होना होगा।
-- नृपेन्द्र अभिषेक नृप



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