दुनिया की पहचान है सृष्टि की जननी:- नृपेंद्र अभिषेक 'नृप'
दर्द तो यह है कि यह सितम उस पर उसी पुरूष द्वारा डाल जाता है जिसको उसने अपनी ममता के शीतल छांव में ढक कर रखा है। दया और ममता की देवी पर इतना बड़ा बड़ा सामाजिक अत्याचार क्यो हो रहा है? कब तक उसका बलात्कार करेगा यह समाज? कब तक उसे जिंदा जलना होगा? उसे कब तक नंगा घूमना होगा?
"नारी तुम प्रेम हो, आस्था हो, विश्वास हो, टूटी हुई उम्मीदों की एकमात्र आस हो।" अपनी ममता और आंसुओ से देश का बचपन सँवारने वाली औरत , मां , बेटी ,बहन या पत्नी बनकर पुरुषों का जीवन संवारने वाली औरत आज भी जुल्मो सितम की सलीब पर टंगी है। दर्द तो यह है कि यह सितम उस पर उसी पुरूष द्वारा डाल जाता है जिसको उसने अपनी ममता के शीतल छांव में ढक कर रखा है।
दया और ममता की देवी पर इतना बड़ा बड़ा सामाजिक अत्याचार क्यो हो रहा है? कब तक उसका बलात्कार करेगा यह समाज? कब तक उसे जिंदा जलना होगा? उसे कब तक नंगा घूमना होगा? आज जब वह ज्ञान की रोशनी पा कर तमाम पर्दो को चीरती हुई आसमां को छूने के लिए निकल पड़ी है तो फिर उस पर बलात्कार जैसे धारदार हथियार से सिर्फ हमला ही नही किया जा रहा है बल्कि उसे जिंदा जला दिया जा रहा है। कैसा है हमारा समाज और कानून जहां ऐसा कोई दिन नहीं होता जब किसी लड़की, बच्ची के साथ कोई जघन्य बलात्कार और हत्या ना होती हो। महिलाओं के शशक्तिकरण में उनके खिलाफ हो रहे हिंसा उनके सामने मिल का पत्थर बन के खड़ा है।
आज समाज को जरूरत है महिलाओं को उनका हक देने का- "अपमान न करना नारियों का, इनके बल पर जग चलता हैं, पुरूष जन्म लेकर तो इन्हीं के गोद में पलता हैं।"
देश की तरक्की करनी है तो महिलाओं को सशक्त बनाना होगा। महिलायें कितनी सक्षम हैं ये किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है महिलाओं ने खुद ही अपनी हिम्मत और श्रम से हर समाज और हर दौर में इसे साबित किया है। महिलाओं के सशक्तिकरण का मतलब है कि महिलाओं को अपनी जिंदगी का फैसला करने की स्वतंत्रता देना या उनमें ऐसी क्षमताएं पैदा करना ताकि वे समाज में अपना सही स्थान स्थापित कर सकें। वैसे रूढ़िवादी मान्यताओं और पुरूष प्रधान विचार को महिलायें अब चुनौती दे रही हैं और हर क्षेत्र में अपने हुनर को आजमा रही हैं। औरते अब तो नई-नई सफलता की मिशालें गढ़ रहीं हैं। समाज के पढ़े लिखे लोग लड़कियों की शिक्षा के प्रति जागरूक हो रहे हैं और शिक्षित महिलायें देश के विकास में अपना अहम योगदान दे रही हैं।
देश, समाज और परिवार के उज्जवल भविष्य के लिये महिला सशक्तिकरण बेहद जरुरी है। महिलाओं को स्वच्छ और उपयुक्त पर्यावरण की जरुरत है जिससे कि वो हर क्षेत्र में अपना खुद का फैसला ले सकें चाहे वो स्वयं, देश, परिवार या समाज किसी के लिये भी हो। देश को पूरी तरह से विकसित बनाने तथा विकास के लक्ष्य को पाने के लिये एक जरुरी हथियार के रुप में है महिला सशक्तिकरण। भारत का संविधान दुनिया में सबसे अच्छा समानता प्रदान करने वाले दस्तावेजों में से एक है। यह विशेष रूप से लिंग समानता को सुरक्षित करने के प्रावधान प्रदान करता है। नारी तो-
"नारी शक्ति है,
सम्मान है,
नारी गौरव है,
अभिमान है,
नारी ने ही ये रचा विधान है,
हमारा शत-शत प्रणाम है।"
सिंधुघाटी सभ्यता से लेकर अब तक भारतीय महिलाओं के सम्मान स्तर में काफी कमी आयी, हालांकि आधुनिक युग में कई भारतीय महिलाएं कई सारे महत्वपूर्ण राजनैतिक तथा प्रशासनिक पदों पर पदस्थ हैं फिर भी सामान्य ग्रामीण महिलाएं आज भी अपने घरों में रहने के लिए बाध्य है और उन्हें सामान्य स्वास्थ्य सुविधा और शिक्षा जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध नही है। आज महिलाएं अपने करियर को लेकर गंभीर हैं, हांलाकि, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है, जैसे दहेज प्रथा, यौन हिंसा, अशिक्षा, भ्रूण हत्या, असमानता, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, कार्य स्थल पर यौन शोषण, बाल मजदूरी, वैश्यावृति, मानव तस्करी और ऐसे ही दूसरे विषय. लैंगिक भेदभाव राष्ट्र में सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक अंतर ले आता है जो देश को पीछे की ओर ढ़केलता है।
महिलाओं को समाज में जिस बर्ताव और जिस हिंसा का सामना करना पड़ता है उसका एक भयानक रूप एसिड हमला है। हाल ही में इस ज्वलन्त मुद्दे को सिनेमा में भी दिखाया गया है, जो समाज को उनके दर्द को दिखा रहा है। पूरी दुनिया में लड़कियों और औरतों पर एसिड अटैक जैसी भयानकतम वारदातों के साथ एक गंभीर प्रश्न कानून व्यवस्था के साथ बाजार का भी जुड़ा हुआ है। किसी भी पीड़ित के मन में ये सवाल पैदा होना लाज़िमी है कि क्या तेज़ाब जैसी संवेदनशील वस्तु की बिक्री और उपलब्धता बाजार में अन्य सामानों की तरह होनी चाहिए? समाज में जिस तरह से उनके साथ बुरा बरताव किया जा रहा है और उन्हें अस्पृश्य बना दिया गया है वो अमानवीय है। आज इस एसिड अटैक की वजह से बहुत सारी लड़कियों और महिलाओं की जान जा चुकी है, लड़कियों और महिलाओं कि ज़िंदगी बर्बाद हो चुकी है, बहुत सारी लड़कियां और महिलाएं आज बद से बदतर हालात में अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं। एसिड अटैक पर न्यायपालिका के साथ-साथ सरकार को अब ऐसे कुछ सख्त क़ानून बनाने चाहिए जो इस देश के साथ साथ दुनिया के लिए एक ट्रेंड सेटर साबित हो साथ ही ऐसा कोई कानूनी प्रावधान भी होना चाहिए जिसमें एसिड हमलों की शिकार महिला को सभी तरह की सुरक्षा और सुविधाएं सुनिश्चित हो।
हम आजाद देश के नागरिक है लेकिन ये कैसी आजादी है जहाँ पर महिलाओं को आज भी शाम होने के बाद बाहर निकलने में संकोच है। ज्यादा रात होने पर या हैदराबाद या निर्भया जैसी घटना को अंजाम देने से भी लोग बाज नही आते है।प्रश्न यह उठता है कि दिनदहाड़े हो या फिर रात के अंधेरे में, आखिर कोई महिला बच्ची सुरक्षित क्यों नहीं है? कहां है शासन और कानून? और ऐसी घटनाएं इसके बावजूद हो रही है तो ऐसे पत्थर हृदय नेता और अधिकारी किस मुंह से अपने पदों पर बैठे हुए हैं। वह वक्त था जब निर्भया कांड के समय पूरे केंद्र सरकार को लोगो ने कठघरे में खड़ा कर दिया था लेकिन क्या आज हम ऐसा कर रहे है? आज सभी बलात्कार को भी धर्म का रूप देने में लगें तो वही कई लोग राजनीति की रोटी सेक कर अपनी वोट बैंक तैयार करने में लगे है। कैंडल मार्च से इस समस्या का समाधान नही होने वाला है।सिर्फ मोमबत्तियां जलाकर पुष्पाजंलि अर्पित करना सिर्फ एक मानसिक छलावा करने जैसे होगा, समस्या का निदान नहीं, न जाने कितनी मोमबत्तियां इसके पहले भी जलाई गयी और श्रद्धासुमन अर्पित किया गया, लेकिन परिणाम ज्यो का त्यों। बलात्कार जैसी घटनाओं से निजात पाने के लिए कानून का शक्ति से पालन करना होगा, सभी पोर्न साइट्स को पूर्ण प्रतिबंधित करना होगा और सामाजिक रूप से हर माँ पिता का दायित्व बनता है कि अपने बच्चों को शिक्षा दे कि महिलाओ का सम्मान उनका शोषण न करे क्योकि ये जो लोग बलात्कार कर रहे है न वो हमारे से समाज से निकल कर आते है ।
यहां महिलाओं को उपर्युक्त कानून बनाकर काफी शक्तियां दी गई है लेकिन ग्राउंड लेबल पर अभी भी बहुत ज्यादा काम करने की गुंजाइश है, इसके बावजूद महिलायें अपनी ज़िम्मेदारियां बखूबी और बेहद सुंदरता से और खास बात बगैर किसी अपेक्षा के निभाये जा रही हैं। भारत सरकार द्वारा महिला सशक्तिकरण के लिए कई सारी योजनाएं चलायी जाती है। इनमें से कई सारी योजनाएं रोजगार, कृषि और स्वास्थ्य जैसी चीजों के लिए चलायीं जाती है। इन योजनाएं का गठन भारतीय महिलाओं के परिस्थिति को देखते हुए किया गया है ताकि समाज में उनकी भागीदारी को बढ़ाया जा सके।
सचमुच नारी तो - "दुनिया की पहचान है, औरत हर घर की जान है , औरत बेटी, बहन, माँ और पत्नी बनकर,
घर घर की शान है औरत।"
-- नृपेन्द्र अभिषेक नृप,
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