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पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर जी में सादगी ऐसी थी कि उन्होंने जीवन में कभी जूता तक नहीं पहना :-अर्जुन भारतीय

डी.एन.कुशवाहा, रामगढ़व।
पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर का 1 जुलाई को जन्मदिन था। उनकी अनेक स्मृतियां ताजा हो गई । वर्षों उनके सानिध्य में रहने,राजनीति करने ,परहेज करने तथा सादगी में जीने अवसर प्राप्त हुआ था।उनके अन्दर सादगी ऐसी थी कि उन्होंने जीवन में कभी  जूता तक नहीं पहना। सिर्फ चमड़े का साधारण चप्पल ही वे आजीवन धारण करते रहे। धोती, कुर्ता एवं बंडी तथा धोती के नीचे लंगोटी। बस, यही उनके जीवन का स्तर था।
    साठ के दशक के विचित्र परिस्थिति में वे सोशलिस्ट राजनीति में सक्रिय हुए। तब  वे इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ एम.ए.की पढ़ाई पूरी कर ली थी।अब वे डॉक्टरेट की डिग्री लेकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर बनना चाह रहे थे। वे इस आकांक्षा के साथ बनारस पहुंचे ,जहां बीएचयू में तब आचार्य नरेंद्र देव वाइस चांसलर के पद पर आसीन थे। लेकिन आचार्य नरेंद्र देव वाइस चांसलर के साथ-साथ सोशलिस्ट के प्रख्यात नेताओं में से एक थे। उन्ही आचार्य जी की देख-रेख में चंद्रशेखर जी पीएचडी करना चाहते थे। लेकिन ,वहां समय ने गजब का मोड़ लिया। मिलते ही चंद्रशेखर को आचार्य नरेंद्र देव ने डॉक्टरेट करने की बजाए सोशलिस्ट आंदोलन में सक्रिय होने और बलिया (यूपी) जिले में सोशलिस्ट पार्टी की मेंबरी अभियान चलाने का निर्देश दे दिया। आचार्य नरेंद्र देव जी ने यह कहते हुए कि अब तो देश में  डॉक्टरेट बहुत बन रहे हैं ।आलमीरा से मेंबरी की रसीद का  बंडल निकाल कर चंद्रशेखर को सौंपते हुए आचार्य जी ने उन्हें सोशलिस्ट की  मेंबरी अभियान चलाने का फरमान जारी कर दिया। जीवट के पक्के और संकल्प के धनी जुझारू चंद्रशेखर ने 3 महीने में ही पूरे जिले में सोशलिस्ट की पूरी मेंबरी बना डाली। गांव -गांव ,शहर -शहर। प्रदेश स्तर पर जब सोशलिस्ट संगठन का गठन हुआ ,तब चंद्रशेखर पार्टी के प्रांतीय सचिव बना दिए गए। फिर क्या था? चंद्रशेखर ने कभी मुड़कर नहीं देखा। 1963 में सोशलिस्ट पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का सांसद बना दिया। फिर सियासी सफर का क्रांतिकारी रथ चलता रहा। निरंतर।
     
प्रख्यात सोशलिस्ट नेता अशोक मेहता के सवाल पर सियासी मोड़ ऐसा आया कि चंद्रशेखर को सोशलिस्ट छोड़कर कांग्रेसी बन जाना पड़ा। कांग्रेस के भीतर युवा तुर्क के रूप में उभरे  चंद्रशेखर कांग्रेस की एक प्रमुख हस्ती बन गए और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के अजीज दोस्त भी। कांग्रेस विभाजन ( सिंडिकेट- इंडीकेट) के बाद 1969  तथा पाकिस्तान से युद्ध में ऐतिहासिक शानदार जीत के बाद 1971 में श्रीमती गांधी ने चंद्रशेखर को मंत्रिमंडल में शामिल होने का ऑफर दिया, लेकिन चंद्रशेखर ने दोनों बार मंत्रिमंडल में शामिल होने से सहज भाव से इंकार कर दिया। 1975 में आपातकाल लागू होने पर इंदिरा गांधी ने अपने निकटतम कांग्रेसी सांसद चंद्रशेखर को लोकनायक जयप्रकाश नारायण मोरारजी भाई देसाई जैसे बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के साथ गिरफ्तार करके जेल में डलवा दिया ।आपातकाल के 19 महीने  चंद्रशेखर ने जेल में बिताया। लोकनायक जेपी से निकटता ही चंद्रशेखर की जेल यात्रा का कारण बनी। जनवरी 1977 में आपातकाल हटाया गया और आम चुनाव की घोषणा हुई। 1977 के चुनाव में उत्तर भारत के 9 राज्यों में कांग्रेस का खाता ही नहीं खुला। खुद इंदिरा गांधी तथा उनके युवराज संजय गांधी डेढ़ -डेढ़ लाख वोट से पराजित हो गए। 5 दलों को मिलाकर लोकनायक जेपी के पहल पर जनता पार्टी का गठन हुआ ,जिसके अध्यक्ष बने युवा तुर्क नेता चंद्रशेखर। मोरारजी भाई देसाई ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। उन्होंने भी चंद्रशेखर को मंत्रिमंडल में शामिल होने का अनुरोध किया ।परंतु चंद्रशेखर ने अपनी जगह मोहन धारिया अथवा कृष्णकांत को मंत्रिमंडल में रखने का सुझाव दे दिया और अपने अलग हो गए । 1989 में  बीपी सिंह ने भी चंद्रशेखर को  अपने मंत्रिमंडल में रखने की कोशिश की थी। जो व्यक्ति  इंदिरा गांधी  तथा मोरारजी भाई देसाई  के मंत्रिमंडल में  शामिल होने से  इनकार कर दिया था । भला  वे  बीपी सिंह के मंत्रिमंडल में  शामिल कैसे होते?और अंत में 1991 में चंद्रशेखर उन विकट परिस्थितियों में बने तो सीधे  प्रधानमंत्री बने। उस समय देश संकट के भंवर जाल में फंसा था। उनके प्रधानमंत्री बनते ही तोड़फोड़, आगजनी एवं अराजकता में डूबा देश 1 सप्ताह के भीतर आश्चर्यजनक तरीके बिल्कुल सामान्य बन गया था।जो चंद्रशेखर की काबिलियत की वजह से संभव हो सका।
     
 चंद्रशेखर के संबंध में देश और विदेश से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण संस्मरणों को उद्धृत  किया जा सकता है।जिसमें नेपाल तथा चंपारण से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण संस्मरण हैं।खास कर रक्सौल से जुड़े तो अनेकों हैं। मेरे प्रयास से उनका साल मे एक दो बार रक्सौल का कार्यक्रम तो बनता ही था। जो सिलसिला वर्षों तक चलता रहा। 4 महीने के लिए जब वे प्रधानमंत्री बने तो उस अल्पावधि में चंद्रशेखर का रक्सौल में दोबारा आना हुआ। आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं, तब रह रहकर उनकी यादें ताजा हो जा रही हैं। उनके जन्मदिन पर उनके विराट व्यक्तित्व तथा उनके महान योगदान के स्मृति -चरणों में हमारा कोटि- कोटि नमन! विनम्र श्रद्धांजलि।!- अर्जुन भारतीय.

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