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चंपारण प्रेस क्लब द्वारा आयोजित दो दिवसीय सेमिनार का उद्घाटन किया केंद्रीय कृषि मंत्री ने

स्मृति चिन्ह देते कृषि मंत्री राधामोहन सिंह
रवि गुप्ता मोतिहारी
मोतिहारी - चंपारण सत्याग्रह वर्ष में विश्व शांति और महात्मा गांधी आईजेयू के तत्वाधान में चंपारण प्रेस क्लब द्वारा आयोजित दो दिवसीय सेमिनार का उद्घाटन करते हुए केंद्रीय कृषि कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा कि पत्रकार का काम समाज के अच्छी बुरी घटनाओं को समाज के सामने लाना है। विकट परिस्थिति में भी पत्रकार अपने दायित्व का निर्वहन देश विदेश में करते रहते हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आजादी के बाद जब देश में इमरजेंसी लगी तब भी पत्रकारिता ने सत्ता के दवाबों को झेलते हुए लोगों को जगाने का काम किया। महात्मा गांधी व महात्मा बुद्ध की कर्मभूमि चंपारण से एक बार फिर से शांति, अहिंसा का संदेश पूरे विश्व में जाना
सेमिनार में भाग लेते पत्रकार गण
चाहिए।  उन्होंने कहा कि देश में किसानों की दशा दिशा को बदलने का काम 1917 में चंपारण आकर महात्मा गांधी ने किया। जिसके बाद अंग्रेजों को देश को छोड़ कर जाना पड़ा। आज के किसानों के हालात पर भी उन्होंने कहा कि देश के किसान की दशा दिशा बदलने की जरूरत है। जिससे भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसान फिर से खुशहाल हो सके।
 बिहार विधान सभा के अध्यक्ष विजय चौधरी ने कहा कि चंपारण की धरती बड़ी जरखेज है। यहां से 1917 में उठी आवाज इतनी बुलंद हुई की अंग्रेजों को भारत छोड़ कर जाना पड़ा। आज के दौर में विश्व शांति और महात्मा गांधी बड़ा मौजू है। चंपारण में गांधी का आना तथा यहां की किसानों की पीड़ा को सुन कर इस धरती को अहिंसा की प्रयोग स्थली बनाना बड़ी बात है। राजकुमार शुक्ल जैसे साधारण आदमी ने अपने दृढ़ निश्चय के बल पर गांधी को चंपारण आने पर मजबूर किया। महात्मा गांधी ने बाद में लिखा है कि मैंने इस हठी किसान के कारण मैं चंपारण आया। जिसके कारण किसान को पचकठिया या तीन कठिया प्रथा से त्रस्त किसान को इससे मुक्ति मिली। विधान सभा अध्यक्ष ने कहा कि पहले अंग्रेज अमेरिका में नील की खेती करते थे। लेकिन 18 वीं शताब्दी में जब अमेरिका में स्वतंत्रता आंदोलन शुरू हुआ तो वहां से नील की खेती को अंग्रेजों ने भारत शिफ्ट किया। जिसके बाद चंपारण में नील की खेती शुरू हुई और यहां के किसान का शोषण शुरू हुआ। चंपारण के पहले पत्रकार पीर मुनीर का जिक्र करते हुए विधान सभा अध्यक्ष ने कहा कि 1917 में चंपारण में कैथी भाषा लिखी व पढ़ी जाती थी। उस समय चंपारण की दशा दिशा को पीर मोहम्मद मुनीर देवनागरी में इस व्यथा को लिख कर देते थे.

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